देशभर में पशुपालन अब केवल परंपरागत तरीका नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक मजबूत आधार और आय का प्रमुख स्रोत बनता जा रहा है। खासतौर पर भैंस पालन की बात करें तो लाखों पशुपालक दूध और उससे बने उत्पादों की बिक्री से न केवल घर चला रहे हैं, बल्कि अच्छा मुनाफा भी कमा रहे हैं। ऐसे में सही नस्ल का चुनाव इस व्यवसाय की सफलता में अहम भूमिका निभाता है। इसी कड़ी में मुर्रा नस्ल की भैंस को सबसे उपयुक्त और लाभकारी माना जाता है। हरियाणा के हिसार स्थित केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान (CIRB) के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. सज्जन सिंह बताते हैं कि मुर्रा भैंस भारत में सबसे ज्यादा पाली जाने वाली नस्लों में से एक है। यह न केवल अधिक दूध देती है, बल्कि इसके दूध की गुणवत्ता भी बेहतरीन होती है। यही कारण है कि मुर्रा भैंस का दूध विदेशों तक में निर्यात किया जा रहा है। आज मुर्रा नस्ल को कई राज्यों की सरकारी पशुपालन योजनाओं में भी शामिल किया जा चुका है।
मुर्रा भैंस मूल रूप से हरियाणा के रोहतक, हिसार, झज्जर, जींद, गुड़गांव और फतेहाबाद जिलों में पाई जाती है, लेकिन अब इसे दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी बड़े स्तर पर पाला जा रहा है। इसकी मांग भारत में ही नहीं, बल्कि चीन, मलेशिया, श्रीलंका, नेपाल, थाईलैंड, ब्राज़ील और वियतनाम जैसे देशों में भी तेजी से बढ़ रही है। यही वजह है कि यह नस्ल अब वैश्विक स्तर पर भी पहचान बना चुकी है।
मुर्रा नस्ल की भैंस की कीमत लगभग 80 हजार रुपये से शुरू होकर एक लाख रुपये तक पहुंचती है। यह भैंस पहले बछड़े के जन्म के बाद प्रतिदिन 12 से 15 लीटर तक दूध देने में सक्षम होती है। इसके दूध में वसा की मात्रा अन्य नस्लों की तुलना में अधिक होती है, जिससे इससे बने उत्पादों को बाजार में ऊंचे दाम मिलते हैं। यही वजह है कि छोटे पशुपालकों से लेकर बड़े डेयरी उद्यमियों तक, सभी मुर्रा नस्ल को प्राथमिकता दे रहे हैं। भैंस पालने के लिए उचित देखरेख और पोषण की जरूरत होती है। मुर्रा भैंस के लिए ऐसा शेड जरूरी है जो हवादार हो, जिसकी दीवारें सीमेंट की बनी हों और फर्श कच्चा हो। आहार के रूप में इन्हें बरसीम, जई, बाजरा, सरसों, ज्वार और ग्वारफली दी जाती है। साथ ही खली, दलिया और गेहूं या दाल की भूसी भी इन्हें खिलाई जाती है, जिससे इनके दूध उत्पादन में वृद्धि होती है।
मुर्रा भैंस की पहचान करना बेहद जरूरी है, खासकर जब इसे खरीदा जा रहा हो। इसकी शुद्ध नस्ल की पहचान 11 प्रमुख शारीरिक लक्षणों के आधार पर की जा सकती है। इनकी त्वचा गहरे काले रंग की होती है, सींग छोटे और पीछे की ओर मुड़े होते हैं, आंखें उभरी हुई और पूंछ करीब 6 इंच लंबी होती है। इनका शरीर भारी और पच्चर के आकार का होता है, गर्दन पतली और लंबी होती है, जबकि कान छोटे और सतर्क दिखाई देते हैं। वयस्क मादा मुर्रा का वजन 350 से 700 किलोग्राम तक होता है और नर का वजन 400 से 800 किलोग्राम तक होता है।
केंद्रीय पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, मुर्रा नस्ल की भैंसें अब भारत के लगभग हर राज्य में पाली जा रही हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में इनकी संख्या तेजी से बढ़ी है। इसके पीछे प्रमुख कारण है बेहतर दूध उत्पादन, रोग प्रतिरोधक क्षमता और बाजार में दूध की ऊंची कीमत। भविष्य की दृष्टि से मुर्रा भैंस पालन एक स्थायी और लाभकारी व्यवसाय के रूप में उभर रहा है। जो लोग पशुपालन से आय बढ़ाने की सोच रहे हैं, उनके लिए मुर्रा नस्ल एक भरोसेमंद और लाभदायक विकल्प बन चुकी है। बाजार की मांग, सरकारी योजनाओं का समर्थन और वैज्ञानिक पोषण के साथ यह नस्ल पशुपालन की दिशा में नए अवसर खोल रही है।
