खेती-किसानी

गैनोडर्मा फफूंद: फलदार पेड़ों का छिपा दुश्मन, समय रहते ऐसे करें बाग का बचाव

नई दिल्ली: भारत के कई हिस्सों में फलदार पेड़ों के लिए गैनोडर्मा नामक फफूंद एक गंभीर खतरे के रूप में उभर रही है। यह कवक पेड़ों की जड़ों और तने के निचले हिस्से को धीरे-धीरे अंदर से गलाकर सड़ा देती है, जिससे पौधों में पानी और पोषक तत्वों का संचार बाधित हो जाता है। विश्व स्तर पर गैनोडर्मा को “रेशी” या “लिंग्ज़ी” के नाम से एक महंगी औषधीय मशरूम के रूप में जाना जाता है, लेकिन कृषि के क्षेत्र में यह एक मौन हत्यारा साबित हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस रोग की शुरुआत जड़ों से होती है और यह लंबे समय तक बिना दिखाई दिए पेड़ को नुकसान पहुंचाता रहता है। शुरुआती दौर में पहचान मुश्किल होने के कारण किसान अक्सर देर से सतर्क होते हैं। समय के साथ पत्तियां पीली पड़कर मुरझाने लगती हैं, टहनियां सूख जाती हैं और फलों का आकार व संख्या दोनों घट जाते हैं। सबसे स्पष्ट संकेत पेड़ के तने के निचले हिस्से या जड़ों के पास उगने वाला लकड़ी जैसा मशरूम होता है।

गैनोडर्मा का सबसे खतरनाक पहलू इसकी धीमी लेकिन स्थायी प्रगति है। यह पेड़ की संरचना को कमजोर कर देता है, जिससे अन्य कीट और रोगों के लिए रास्ता आसान हो जाता है। एक बार तना और जड़ पूरी तरह संक्रमित हो जाएं, तो पेड़ को बचाना लगभग असंभव हो जाता है। रोकथाम के लिए किसान बाग में गिरी सूखी पत्तियों, सड़े फलों और टहनियों को समय-समय पर नष्ट करें। पौधारोपण के समय पर्याप्त दूरी रखें ताकि हवा का संचार हो और नमी न जमे। खेत में कार्य करते समय पेड़ों के तने और जड़ों को चोट लगने से बचाना आवश्यक है, क्योंकि इन्हीं घावों से फफूंद प्रवेश करती है। किसी भी चोट पर तुरंत बोर्डो पेस्ट या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का लेप लगाने की सलाह दी जाती है।

नियंत्रण के लिए गोबर की अच्छी सड़ी हुई खाद में ट्राइकोडर्मा मिलाकर जड़ों के पास डालना लाभकारी है। इसके साथ ही, बरसात से पहले और बाद में साल में दो बार पेड़ के तने पर जमीन से 2-3 फीट ऊंचाई तक बोर्डो पेस्ट का लेप करना चाहिए। रोग के लक्षण दिखने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह के बिना कवकनाशी का प्रयोग न करें। नियमित निरीक्षण और समय पर कार्रवाई ही इस समस्या से बागों को बचाने का सबसे कारगर तरीका है।

Related posts

Leave a Comment