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उत्तर भारत में पाला संकट, किसानों की बढ़ी चिंता

Frost crisis in North India

नई दिल्ली: उत्तर भारत इस समय कड़ाके की ठंड की चपेट में है और तापमान लगातार शून्य से नीचे जा रहा है। इसका सीधा असर फसलों पर देखने को मिल रहा है। जब रात का पारा माइनस में गिरता है तो खेतों में जमा ओस बर्फ के खतरनाक कणों में बदल जाती है। यह जमा पानी पौधों की कोशिकाओं और नसों को फाड़ देता है, जिससे फसलें रातों-रात काली पड़कर झुलसने लगती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आलू, टमाटर, सरसों, मटर और पपीता जैसी संवेदनशील फसलें इस ठंड की चपेट में भारी नुकसान का सामना कर सकती हैं। अगर हालात यही रहे तो गेहूं और गन्ने जैसे मजबूत फसलों की पैदावार पर भी असर पड़ सकता है। इससे किसानों की महीनों की मेहनत और पूंजी पर खतरा मंडरा रहा है। उत्तर भारत में पाला संकट ने किसानों की चिंता को बढ़ा दिया है।

कैसे लगता है पाला? कृषि वैज्ञानिकों ने बताया पूरा विज्ञान

कृषि विज्ञान केंद्र नरकटियागंज के डॉ. आर.पी. सिंह बताते हैं कि पाला तब पड़ता है जब दिन में धूप होने के बावजूद शाम के बाद हवा अचानक रुक जाए, रात का आसमान साफ़ हो जाए और हवा में नमी अधिक हो। ऐसी स्थिति में रात का तापमान तेजी से नीचे गिरता है और वातावरण की नमी सीधे बर्फ के कणों में बदल जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, पौधों की कोशिकाओं के अंदर मौजूद पानी जमकर फैलता है, जिससे कोशिकाएं फट जाती हैं और पौधा अंदर से नष्ट होने लगता है। इसके कारण पौधों की वृद्धि रुक जाती है, फूल झड़ जाते हैं, दाने छोटे रह जाते हैं और फसलें काली पड़कर सूख जाती हैं। सबसे ज्यादा खतरा आलू, टमाटर, सरसों, मटर और पपीता की फसलों को है, जबकि अधिक समय तक ठंड रहने पर गेहूं और गन्ना भी प्रभावित हो सकते हैं।

किसान कर रहे जमीनी स्तर पर संघर्ष, अपनाए जा रहे पारंपरिक तरीके

ठंड और पाले की चुनौतियों से निपटने के लिए किसान मैदान में जुट गए हैं। खेत की मेंड़ों पर घास या लकड़ी जलाकर धुआं किया जा रहा है ताकि खेत के ऊपर एक गर्म परत बन सके और तापमान गिरने न पाए। किसान मानते हैं कि धुआं करने से पौधों को गर्माहट मिलती है और बर्फ बनने की संभावना घटती है। वहीं, कई किसान रात में हल्की सिंचाई कर रहे हैं क्योंकि गीली मिट्टी का तापमान सूखी मिट्टी से ज्यादा होता है, जिससे फसल को पाले से सुरक्षा मिलती है।

वैज्ञानिक उपाय भी आ रहे सामने

विशेषज्ञों के अनुसार सुबह रस्सी से हल्के झटके देकर पत्तों पर जमा ओस हटाना भी एक कारगर तरीका है। इससे ओस नीचे गिर जाती है और बर्फ जमने का खतरा कम हो जाता है। छोटे पौधों को बचाने के लिए पुआल, घास या प्लास्टिक से ढकने की सलाह भी दी जा रही है ताकि ठंडी हवाओं का सीधा प्रभाव न पड़े।

कृषि वैज्ञानिक सल्फर घोल और ग्लूकोज स्प्रे को भी उपयोगी मानते हैं। 15 लीटर पानी में 40 ग्राम घुलनशील सल्फर या 25 ग्राम ग्लूकोज मिलाकर फसल पर छिड़काव करने से पौधों में मजबूती आती है और पाले का असर कम होता है। इसके अलावा यूरिया, थायो यूरिया और म्यूरेट ऑफ पोटाश का छिड़काव भी फसलों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।

लंबी अवधि के प्रबंधन से बच सकती है फसल

विशेषज्ञों का मानना है कि खेत की उत्तर-पश्चिम दिशा में शीशम, आम, बबूल जैसे वायुरोधक पेड़ लगाना लंबी अवधि में फायदेमंद साबित हो सकता है। इससे खेतों के ऊपर चलने वाली ठंडी हवाओं की गति कम हो जाती है और पाले का खतरा नियंत्रित रहता है। कुल मिलाकर, उत्तर भारत में बढ़ती ठंड कृषि क्षेत्र के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। किसान खेतों में रातभर जागकर फसल बचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मौसम अगर इसी तरह बर्फीला बना रहा तो रबी सीजन की पैदावार पर भारी संकट तय माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सही समय पर सही कदम उठाकर किसान बड़ी हानि से बच सकते हैं।

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