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डीएपी खाद की किल्लत से जूझ रहे किसान, रोपाई में हो रही देरी, सरकार ने किया बड़ा अंतरराष्ट्रीय समझौता

नई दिल्ली: देश के प्रमुख कृषि राज्य उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में इन दिनों डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) खाद की भारी किल्लत देखने को मिल रही है। हालात इतने विकट हो चुके हैं कि किसान रातभर सहकारी समितियों और दुकानों के बाहर कतारों में खड़े रहने को मजबूर हैं। कई जिलों में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा है, फिर भी किसानों को खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। डीएपी, जो यूरिया के बाद सबसे अधिक उपयोग होने वाला उर्वरक है, उसकी भारत में सालाना खपत करीब 100 लाख टन है, जबकि घरेलू उत्पादन महज 45 से 48 लाख टन के आसपास रहता है। बाकी की आपूर्ति आयात के जरिए होती है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 60 फीसदी डीएपी आयात करता है, और यह आयात भी ज्यादातर कच्चे माल जैसे रॉक फॉस्फेट और फॉस्फोरिक एसिड पर आधारित है।

चीन की रोक से और गहराया संकट

डीएपी की मौजूदा किल्लत का बड़ा कारण चीन द्वारा फॉस्फेट उर्वरकों के निर्यात पर रोक लगाना है। 26 जून से चीन ने विशेष खाद शिपमेंट बंद कर दिए, जिससे भारत में उत्पादन पर सीधा असर पड़ा है। इसका असर खरीफ फसलों पर दिखने लगा है। धान और मक्के की बुवाई का समय चल रहा है, और डीएपी की अनुपलब्धता से बुआई में देरी हो रही है, जिससे रबी सीजन की तैयारी पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

एसएसपी और टीएसपी जैसे विकल्पों पर विशेषज्ञों की सलाह

इस गंभीर स्थिति में कृषि विशेषज्ञ किसानों को डीएपी के विकल्प अपनाने की सलाह दे रहे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के फसल विज्ञान प्रमुख डॉ. राजीव कुमार सिंह के अनुसार, सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है। इसमें 16% फॉस्फोरस, 11% सल्फर और पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम मौजूद होता है। सल्फर की मौजूदगी इसे दलहनी और तिलहनी फसलों के लिए विशेष रूप से उपयोगी बनाती है।

डॉ. सिंह के मुताबिक, दो-तीन बैग एसएसपी और एक बैग यूरिया का मिश्रण पौधों को पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, कैल्शियम और सल्फर प्रदान कर सकता है। वहीं, ट्रिपल सुपर फॉस्फेट (टीएसपी) के साथ यूरिया का उपयोग भी लगभग डीएपी के बराबर पोषण प्रदान करता है। टीएसपी में 46% फॉस्फोरस होता है, और 20 किलो यूरिया के साथ इसका उपयोग कारगर माना गया है।

नैनो और जैव उर्वरकों पर भी जोर

विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया है कि किसानों को नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसे लिक्विड उर्वरकों की ओर रुख करना चाहिए। इससे न सिर्फ लागत घटेगी, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बेहतर होगी। इसके अलावा फास्फोरस सोलुबलाइजिंग बैक्टीरिया (PSB) और जैव उर्वरकों का उपयोग कर भी पोषक तत्वों की पूर्ति की जा सकती है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर मृदा स्वास्थ्य कार्ड के अनुरूप उर्वरकों का उपयोग किसानों को अधिक लाभ दे सकता है।

सऊदी अरब के साथ भारत का बड़ा समझौता

डीएपी की किल्लत से जूझते किसानों के लिए एक राहत भरी खबर यह है कि भारतीय उर्वरक कंपनियों – इंडियन फर्टिलाइजर कंपनी (IPL), कृभको (KRIBHCO) और सीआईएल (CIL) ने सऊदी अरब की कंपनी मादेन (Maaden) के साथ बड़ा समझौता किया है। इस समझौते के तहत मादेन हर साल भारत को 3.1 मिलियन टन डीएपी की आपूर्ति करेगा।

यह समझौता वर्तमान वित्तीय वर्ष से लागू हो गया है और इसे आपसी सहमति से पांच साल तक और बढ़ाया जा सकता है। यह करार केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री जेपी नड्डा की सऊदी यात्रा के दौरान उनके साक्ष्य में संपन्न हुआ। इस रणनीतिक पहल से भारत में डीएपी की आपूर्ति सुनिश्चित होगी और किसानों को खरीफ सीजन में आवश्यक खाद मिल सकेगी। डीएपी की मौजूदा कमी ने देशभर के किसानों को संकट में डाल दिया है, लेकिन विशेषज्ञों के सुझाव और सरकार की पहल इस संकट से उबरने का रास्ता दिखा रही हैं। समय रहते विकल्पों को अपनाकर और नई तकनीकों का सहारा लेकर किसान अपनी फसलें बचा सकते हैं। सरकार द्वारा किए गए अंतरराष्ट्रीय समझौते निकट भविष्य में खाद की आपूर्ति को स्थिर करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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