कृषि समाचार

इथेनॉल से किसानों की आय बढ़ी या सिर्फ प्रचार? किसानों ने बताई हकीकत

Ethanol production in India

नई दिल्ली: पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने हाल ही में दावा किया कि जो पैसा पहले कच्चे तेल के आयात पर खर्च होता था, वह अब किसानों के पास जा रहा है। मंत्रालय के मुताबिक, किसान अब केवल ‘अन्नदाता’ ही नहीं बल्कि ‘ऊर्जादाता’ भी बन गए हैं। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी कई बार कहा है कि इथेनॉल उत्पादन से किसानों को सीधा आर्थिक लाभ हो रहा है। लेकिन जब ज़मीनी स्तर पर यूपी से लेकर महाराष्ट्र तक किसानों से इस दावे पर सवाल किया गया, तो तस्वीर कुछ अलग ही दिखी। इथेनॉल से किसानों की आय बढ़ी या नहीं? इसकी ज़मीनी हकीकत क्या है? ये जानना ज़रूरी है?

किसानों ने साफ कहा कि उन्हें इथेनॉल से कोई डायरेक्ट फायदा नहीं मिला। चीनी मिलें पहले भी एफआरपी (Fair and Remunerative Price) या एसएपी (State Advised Price) पर गन्ना खरीदती थीं, और अब भी वही कीमत दे रही हैं। इथेनॉल उत्पादन के बावजूद किसानों को एक रुपया भी अतिरिक्त नहीं मिल रहा।

भुगतान थोड़ा तेज़ हुआ, पर क्या यही सफलता है?

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की रिपोर्ट के अनुसार, गन्ना किसानों का भुगतान पहले की तुलना में थोड़ा जल्दी होने लगा है। यही बात अब सरकार की बड़ी सफलता के रूप में प्रचारित की जा रही है। लेकिन सवाल यह उठता है क्या भुगतान में देरी होना सरकार या चीनी मिलों का अधिकार है? अगर नहीं, तो फिर भुगतान समय पर होना ‘उपलब्धि’ कैसे माना जा सकता है?

कानून के अनुसार, शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर 1966 की धारा 3(3) और (3A) के तहत मिलों को गन्ने की डिलीवरी के 14 दिन के भीतर भुगतान करना अनिवार्य है। देरी पर 15% वार्षिक ब्याज देना भी अनिवार्य है। इसके बावजूद किसानों को महीनों तक भुगतान नहीं मिलता था। अब जबकि भुगतान थोड़ा जल्दी हो रहा है, सरकार इसे “इथेनॉल की सफलता” बताकर राजनीतिक श्रेय ले रही है।

अभी भी 14 दिन में भुगतान नहीं

उत्तर प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र के कई किसानों का कहना है कि अब भी बहुत कम मिलें ऐसी हैं जो 14 दिन के भीतर भुगतान करती हों। अधिकतर मिलों में भुगतान में 1 से 6 महीने तक की देरी होती है। किसानों ने कहा कि इथेनॉल उत्पादन से उन्हें कोई अतिरिक्त आय नहीं मिली, सिर्फ भुगतान की प्रक्रिया थोड़ी तेज़ हुई है, जो पहले से ही मिलों की जिम्मेदारी थी।

सिर्फ इथेनॉल को श्रेय नहीं, कई योजनाओं का असर

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की रिपोर्ट यह भी बताती है कि इथेनॉल उत्पादन के अलावा कई अन्य सरकारी पहलों ने भी चीनी मिलों की नकदी स्थिति में सुधार किया। 2017-18 में रिकॉर्ड गन्ना उत्पादन के कारण चीनी की कीमतें गिरीं और मिलों पर बकाया राशि बढ़ी। इसके बाद सरकार ने कई कदम उठाए:

  • राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति 2018
  • इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (EBP)
  • गन्ने की लागत की भरपाई के लिए सहायता राशि
  • निर्यात सुविधा और रियायती ऋण
  • चीनी के लिए न्यूनतम विक्रय मूल्य (MSP)

इन योजनाओं से नकदी प्रवाह सुधरा और गन्ना बकाया राशि 2019-20 में 16.4% से घटकर 2023-24 में 3.5% रह गई। इथेनॉल उत्पादन में भी तेजी आई, जो 2018-19 में 3 लाख टन से बढ़कर 2022-23 में 43 लाख टन तक पहुंच गया।

मक्का किसानों को भी नहीं मिला खास फायदा

सरकार यह भी दावा करती है कि इथेनॉल नीति से मक्का किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं। लेकिन CACP की रिपोर्ट बताती है कि पिछले पांच सालों में मक्का किसानों को एमएसपी के बराबर भी औसत दाम नहीं मिले। ‘सी2 लागत’ यानी भूमि, पूंजी और ब्याज समेत पूरी उत्पादन लागत को भी कई बार पूरा नहीं किया जा सका। ऐसे में इथेनॉल को किसानों की आय बढ़ाने का प्रमुख साधन बताना भ्रामक माना जा रहा है।

निष्कर्ष: इथेनॉल से फायदा ‘सरकार को’, किसान अब भी इंतज़ार में

सरकार इथेनॉल उत्पादन को आत्मनिर्भर भारत का अहम हिस्सा मान रही है और दावा करती है कि इससे किसानों की आय में बढ़ोतरी हुई है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि किसान अब भी पुराने दामों पर ही गन्ना बेच रहे हैं। इथेनॉल नीति से सबसे ज्यादा लाभ चीनी मिलों और पेट्रोलियम सेक्टर को हुआ है जबकि किसान केवल ‘ऊर्जादाता’ कहलाने तक सीमित रह गए हैं।

ये भी पढ़ें: भारत में दालों की आत्मनिर्भरता पर सवाल, रकबा घटा 31 लाख हेक्टेयर

Related posts

Leave a Comment