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कोऑपरेटिव डेयरी से पशुपालकों को ज्यादा मुनाफा: अमित शाह

Cooperative Dairy

नई दिल्ली: केन्द्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह ने डेयरी क्षेत्र को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि पशुपालकों, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की माताओं और बेटियों को दूध बेचकर अधिक मुनाफा केवल कोऑपरेटिव डेयरी मॉडल से मिलता है। उनका कहना है कि निजी डेयरी कंपनियों का कारोबार भले ही कितना भी बढ़ जाए, लेकिन पशुपालकों को तयशुदा भुगतान ही मिलता है, जबकि सहकारी मॉडल में पूरा लाभ उत्पादकों तक पहुंचता है।

अमूल मॉडल का दिया उदाहरण

अपने संबोधन में उन्होंने अमूल का उदाहरण देते हुए कहा कि इस कोऑपरेटिव डेयरी मॉडल में होने वाला संपूर्ण मुनाफा पशुपालकों के हाथों में जाता है। यही सहकारी और निजी डेयरी के बीच बुनियादी अंतर है। हाल ही में सहकारिता से जुड़े एक कार्यक्रम में उन्होंने यह बात दोहराई और डेयरी क्षेत्र में सहकारी ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया।

करोड़ों परिवार जुड़े, पर लाभ सीमित

डेयरी विशेषज्ञों के अनुसार देशभर में लगभग आठ करोड़ परिवार दूध उत्पादन से जुड़े हैं, लेकिन इनमें से केवल डेढ़ करोड़ परिवार ही सहकारी डेयरी संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। इसका अर्थ है कि करीब 6.5 करोड़ परिवारों को दूध का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में सहकारी मॉडल के विस्तार को समय की जरूरत बताया जा रहा है।

कोऑपरेटिव डेयरी मॉडल में किसानों को अधिक हिस्सा

अमित शाह पहले भी कह चुके हैं कि सहकारी डेयरी क्षेत्र में उपभोक्ता द्वारा खर्च किए गए धन का 75 प्रतिशत से अधिक हिस्सा किसानों को वापस मिलता है, जबकि कॉर्पोरेट क्षेत्र में यह हिस्सा लगभग 32 प्रतिशत ही रहता है। उन्होंने कहा कि देश के हर डेयरी किसान के लिए इस अंतर को कम करना आवश्यक है। साथ ही कॉर्पोरेट क्षेत्र से जुड़े डेयरी किसानों को भी सहकारी ढांचे से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।

वित्तीय मजबूती के लिए नई पहल

पशुपालकों की आय बढ़ाने और जरूरत के समय आसान वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए ‘कोऑपरेशन अमंगस्ट कोऑपरेटिव्स’ पहल शुरू की गई है। इसके तहत पशुपालकों के बैंक खाते सहकारी बैंकों में खोले जा रहे हैं। गुजरात में 93 प्रतिशत संस्थाओं के खाते सहकारी बैंकों में खुल चुके हैं, जिससे सहकारिता क्षेत्र को वित्तीय मजबूती मिली है और बैंकिंग व्यवस्था भी मजबूत हुई है। माइक्रो एटीएम मॉडल के जरिए पशुपालकों को भुगतान और लेन-देन में भी सुविधा मिल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सहकारी डेयरी मॉडल को व्यापक स्तर पर लागू किया गया तो इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

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