पंजाब में आई विनाशकारी बाढ़ ने इस बार बासमती धान की फसल को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। अपनी पतली लंबी बनावट, समृद्ध खुशबू और बेहतरीन स्वाद के लिए दुनियाभर में मशहूर बासमती धान इस बार चार दशकों की सबसे भीषण बाढ़ और लगातार भारी बारिश की चपेट में आ गया। अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारण और कपूरथला जैसे प्रमुख बासमती उत्पादक जिलों में खेत जलमग्न हो गए हैं। अजनाला, रामदास और चोगावां ब्लॉक जैसे इलाकों में तो 50% से ज्यादा खेत डूब चुके हैं।
71,000 एकड़ खेती तबाह, करोड़ों का नुकसान
प्रारंभिक सर्वे के मुताबिक केवल अमृतसर जिले में ही लगभग 71,000 एकड़ कृषि भूमि को नुकसान हुआ है, जिसमें सबसे ज्यादा बासमती की फसल प्रभावित हुई है। गुरदासपुर और पठानकोट जिलों में भी करीब 50,000 एकड़ खेत बाढ़ से बर्बाद हो गए हैं। हालांकि, वास्तविक नुकसान का आकलन पानी उतरने के बाद ही संभव होगा। पंजाब देश के बासमती चावल निर्यात का लगभग 40% हिस्सा देता है। लेकिन इस आपदा ने हजारों किसानों को आर्थिक संकट में डाल दिया है। अनुमान है कि राज्य को करीब 600 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है और इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय निर्यात पर भी पड़ेगा।
कर्ज और पट्टे पर खेती करने वाले किसान सबसे ज्यादा प्रभावित
किसानों का कहना है कि उन्होंने प्रति एकड़ 35,000 से 40,000 रुपये तक का निवेश किया था। कई किसानों ने जमीन पट्टे पर लेकर खेती की और इसके लिए कर्ज भी लिया, लेकिन अब पूरी फसल डूबने से वे दोहरी मार झेल रहे हैं। उत्पादन बर्बाद हो जाने से न तो लागत निकल पा रही है और न ही कर्ज चुकाने की स्थिति बची है।
बासमती के दामों में तेजी की आशंका
उत्पादन घटने की वजह से बासमती चावल की कीमतों में उछाल की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू बाजार के साथ-साथ अमेरिका, ईरान, इराक और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में होने वाले निर्यात पर भी असर पड़ेगा। उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा और किसानों की परेशानियां और गहरी होंगी।
खेतों में पानी, किसानों की उम्मीदें डूबीं
बाढ़ प्रभावित इलाकों में अब भी 4-5 फीट पानी भरा हुआ है और सैकड़ों एकड़ भूमि पूरी तरह जलमग्न है। कई किसान बताते हैं कि उन्होंने लाखों रुपये का निवेश किया था, लेकिन अब उनके सामने केवल बर्बादी बची है। किसानों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि सही सर्वे और राहत समय से मिले, ताकि वे दोबारा खेती शुरू कर सकें। जहां प्रशासन की टीमें हालात का जायजा ले रही हैं, वहीं किसान उम्मीद कर रहे हैं कि इस बार उन्हें सिर्फ आश्वासन नहीं बल्कि ठोस राहत और मदद मिले।
