पटना: बिहार में केले की खेती का दायरा लगातार विस्तार पा रहा है। वर्ष 2004-05 में जहां केवल 27,200 हेक्टेयर भूमि पर केले की खेती होती थी, वहीं 2022-23 तक यह आंकड़ा 42,900 हेक्टेयर तक पहुंच चुका है। इस दौरान केले के उत्पादन में भी 261 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके बावजूद बिहार के बाजारों में आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से आने वाले केलों का दबदबा कायम है। हर दिन 8 से 10 ट्रक केले बिहार के बाहर से मंगाए जा रहे हैं, जिससे स्थानीय उत्पादकों को बाजार में चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
हाजीपुर का चिनिया केला बिहार की सांस्कृतिक और कृषि विरासत का हिस्सा रहा है। इतिहासकारों के अनुसार सातवीं शताब्दी में भारत आए चीनी तीर्थयात्री ह्वेन सांग ने भी हाजीपुर के चिनिया केले का उल्लेख अपने यात्रा वृत्तांत में किया था। उन्होंने वैशाली की भूमि को उपजाऊ बताते हुए लिखा था कि यहां केले की खेती प्रमुख रूप से की जाती है। आज भी हाजीपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में चिनिया, मालभोग, कोठिया और बरेली चिनिया जैसी किस्मों की खेती जारी है, लेकिन इनकी बाजार में पहचान और पहुंच सीमित हो गई है।
पिछले डेढ़ दशक में बिहार में न केवल खेती का क्षेत्रफल बढ़ा है, बल्कि प्रति हेक्टेयर उत्पादन भी 20 मीट्रिक टन से बढ़कर 45 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। राज्य के कई जिलों जैसे हाजीपुर, नवगछिया, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, भागलपुर, पटना, सारण, नालंदा और भोजपुर में केले की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है। पारंपरिक किस्मों के साथ अब टिश्यू कल्चर से तैयार G-9 प्रजाति की मांग भी तेजी से बढ़ रही है, जिससे उत्पादकता में और इजाफा हो रहा है। इसके बावजूद किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। हाजीपुर के किसान अवधेश कुमार सिंह बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में उकठा रोग, आंधी-तूफान और गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण की कमी से खेती को काफी नुकसान पहुंचा है। उनका कहना है कि पहले हाजीपुर का केला देशभर में प्रसिद्ध था, लेकिन अब यह केवल स्थानीय बाजार तक सिमट कर रह गया है। कई किसान अब इस खेती से पीछे हटने लगे हैं और सरकार से विशेष कार्ययोजना की मांग कर रहे हैं ताकि हाजीपुर के केले को दोबारा उसका पुराना गौरव मिल सके।
पटना के फल बाजार में आंध्र प्रदेश से सालभर केले आते हैं, जबकि बिहार में उगने वाला केला केवल मौसम विशेष पर निर्भर करता है। बाजार में स्थायी आपूर्ति और प्रोसेसिंग सुविधाओं की कमी के कारण स्थानीय उत्पादकों को अपना केला अधिक कीमत पर नहीं बेच पाने की मजबूरी झेलनी पड़ती है। फल संघ से जुड़े व्यापारी बताते हैं कि बिहार का केला स्वाद और गुणवत्ता में बेहतर होते हुए भी उसकी आपूर्ति सीमित होने के कारण वह बाजार में टिक नहीं पाता। बेहतर प्रशिक्षण, ब्रांडिंग और वैज्ञानिक तकनीक की मदद से बिहार के केले को दोबारा पहचान दिलाई जा सकती है। हाजीपुर के चिनिया केले जैसे पारंपरिक किस्मों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है, ताकि वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जगह बना सकें। सरकार को चाहिए कि वह न केवल उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे, बल्कि मार्केटिंग, निर्यात और किसानों को उचित मूल्य दिलाने के लिए भी ठोस योजनाएं तैयार करे। तभी बिहार की यह पारंपरिक फसल अपनी वास्तविक पहचान वापस पा सकेगी।
