कृषि पिटारा

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पेश किया ‘माइनस 5, प्लस 10’ फॉर्मूला, जीनोम एडिटिंग से बढ़ेगा उत्पादन, घटेगा लागत

नई दिल्ली: भारत में कृषि क्षेत्र को आत्मनिर्भर और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दलहन और तिलहन के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक नया रणनीतिक फॉर्मूला पेश किया है। इसे ‘माइनस 5 और प्लस 10’ नाम दिया गया है, जिसका मतलब है कि चावल के क्षेत्रफल को 50 लाख हेक्टेयर घटाकर उसी भूमि पर दलहन और तिलहन जैसी पोषक और आर्थिक रूप से लाभकारी फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया जाए, जिससे 100 लाख टन अतिरिक्त उत्पादन हासिल किया जा सके।

यह घोषणा कृषि मंत्री ने उस समय की जब उन्होंने धान की दो नई जीनोम-एडिटेड किस्में – ‘डीआरआर धान 100 (कमला)’ और ‘पूसा डीएसटी राइस 1’ – देश को समर्पित कीं। उन्होंने कहा कि यह देश के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है क्योंकि यह पहली बार है जब भारत में जीनोम एडिटिंग तकनीक से विकसित जलवायु-अनुकूल चावल की किस्में किसानों को सौंपी जा रही हैं। ये किस्में न केवल कम पानी में अच्छी उपज देती हैं बल्कि खेती की लागत भी घटाती हैं और पर्यावरण की दृष्टि से भी फायदेमंद हैं।

इन दोनों किस्मों के बारे में बताया गया है कि ये कम समय में पकती हैं, जिससे किसानों को तीन सिंचाई की बचत होती है और अगली फसल की बुआई समय पर की जा सकती है। अनुमान है कि ये किस्में करीब 5 लाख हेक्टेयर में 45 लाख टन अतिरिक्त धान उत्पादन कर सकती हैं। साथ ही, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी 20 प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकती है।

आईसीएआर के उपमहानिदेशक डॉ. डीके यादव ने जानकारी दी कि जीनोम एडिटिंग के माध्यम से दलहन और तिलहन पर भी कार्य तेजी से चल रहा है। इनमें सरसों की एक किस्म पर विशेष रूप से रिसर्च की जा रही है, जो आने वाले समय में किसानों के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकती है। आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एमएल जाट ने बताया कि इन धान की किस्मों का अखिल भारतीय समन्वित परीक्षण पूरा हो चुका है और जल्द ही इनके बीज किसानों को उपलब्ध कराए जाएंगे।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के पूर्व निदेशक डॉ. एके सिंह ने स्पष्ट किया कि इन किस्मों को सीआरआईएसपीआर-कैस आधारित जीनोम संपादन तकनीक से विकसित किया गया है। इस प्रक्रिया में पौधों के अपने जीन में सूक्ष्म बदलाव किए जाते हैं, बिना किसी बाहरी जीन को जोड़े। भारत सरकार ने एसडीएन1 और एसडीएन2 तकनीकों से विकसित जीन-एडिटेड फसलों को बायोसेफ्टी नियमों से मुक्त कर दिया है, जिससे इन किस्मों को जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि जीनोम एडिटिंग एक क्रांतिकारी तकनीक है जो खाद्य और पोषण सुरक्षा में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। इससे न केवल उत्पादन में बढ़ोतरी होगी, बल्कि सिंचाई जल की खपत कम होने और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती से पर्यावरणीय संतुलन भी बेहतर होगा। इस नई पहल के साथ भारत ने टिकाऊ और तकनीक-संवेदनशील खेती की दिशा में एक ठोस कदम बढ़ा लिया है, जिससे किसान आर्थिक रूप से सशक्त बन सकेंगे और देश की खाद्य सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी।

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