नई दिल्ली: मेथी कम समय में तैयार होने वाली प्रमुख हरी पत्तेदार फसलों में शामिल है। इसकी पत्तियों और बीजों दोनों की बाजार में मांग रहती है। यदि किसान मेथी की बुवाई का सही समय चुनने के साथ खेत की तैयारी, बीज उपचार, सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण और खाद प्रबंधन पर ध्यान दें तो अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। हरी मेथी के लिए सितंबर के तीसरे और चौथे सप्ताह से अक्टूबर-नवंबर तक का समय कई क्षेत्रों में अनुकूल माना जाता है। हालांकि स्थानीय मौसम और किस्म के अनुसार बुवाई का समय अलग हो सकता है।
ठंडे मौसम में अच्छी होती है मेथी की बढ़वार
मेथी की फसल के लिए ठंडा और अपेक्षाकृत शुष्क मौसम अनुकूल माना जाता है। बुवाई के समय तापमान बहुत अधिक होने पर बीजों के अंकुरण और पौधों की शुरुआती बढ़वार पर असर पड़ सकता है। सितंबर के अंतिम हिस्से से नवंबर तक तापमान में गिरावट आने लगती है, जिससे मेथी की फसल के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं। अच्छी नमी और उचित तापमान मिलने पर पौधे तेजी से बढ़ते हैं और पत्तियां हरी तथा कोमल रहती हैं।
सही समय पर बुवाई से बढ़ सकता है उत्पादन
हरी मेथी के लिए किसान अपने क्षेत्र की जलवायु को ध्यान में रखते हुए सितंबर के तीसरे-चौथे सप्ताह से बुवाई शुरू कर सकते हैं। अक्टूबर और नवंबर में भी इसकी बुवाई की जा सकती है। बहुत देर से बुवाई करने पर तापमान और मौसम की परिस्थितियां फसल की बढ़वार को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार बुवाई का समय तय करना बेहतर रहता है।
दोमट मिट्टी मेथी के लिए उपयुक्त
मेथी की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। खेत में पानी का लंबे समय तक जमा रहना फसल के लिए नुकसानदायक हो सकता है। मिट्टी का अम्लीय या क्षारीय स्तर अत्यधिक होने पर पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। इसलिए बुवाई से पहले मिट्टी की जांच कराना उपयोगी रहता है।
बुवाई से पहले खेत को भुरभुरा बनाएं
खेत की अच्छी तैयारी मेथी की समान बढ़वार के लिए महत्वपूर्ण है। बुवाई से पहले एक-दो बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा किया जा सकता है। इसके बाद खेत को समतल करें और अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद, कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी में मिला दें। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने और पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।
बीज की मात्रा और बुवाई की विधि
एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए लगभग 20 से 25 किलोग्राम मेथी बीज की आवश्यकता बताई जाती है। हालांकि बीज की मात्रा किस्म, बुवाई की विधि और खेती के उद्देश्य के अनुसार अलग हो सकती है। बीजों की गुणवत्ता अच्छी होने पर अंकुरण भी बेहतर रहता है। बुवाई से पहले बीजों को कुछ समय पानी में भिगोने से अंकुरण तेजी से शुरू हो सकता है।
बीज उपचार से रोगों का खतरा घटाएं
बुवाई से पहले बीजों का जैविक फफूंदनाशक से उपचार किया जा सकता है। इससे बीज और मिट्टी से जुड़े कुछ रोगों से बचाव में सहायता मिल सकती है। बीजों को लगभग 2 से 3 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना उचित रहता है। पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखने से खेत में हवा का आवागमन बेहतर रहता है और पौधों को पर्याप्त प्रकाश भी मिलता है।
सिंचाई में रखें विशेष सावधानी
मेथी की बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करने की सलाह दी जाती है, ताकि बीजों को अंकुरण के लिए पर्याप्त नमी मिल सके। इसके बाद मिट्टी में उपलब्ध नमी और मौसम के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए। सामान्य परिस्थितियों में लगभग 7 से 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन इसे निश्चित नियम नहीं माना जाना चाहिए।
खेत में पानी जमा न होने दें
मेथी की जड़ों के आसपास लगातार पानी जमा रहने से जड़ गलन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इसलिए सिंचाई हमेशा खेत की मिट्टी की नमी देखकर करें। बारिश होने पर अतिरिक्त पानी की निकासी की उचित व्यवस्था रखें। हल्की मिट्टी में सिंचाई की आवश्यकता भारी मिट्टी की तुलना में अधिक हो सकती है।
खरपतवार नियंत्रण से फसल की बढ़वार बेहतर
मेथी की शुरुआती अवस्था में खरपतवार फसल के साथ पानी और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इससे पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। इसलिए खेत में नियमित रूप से खरपतवार की निगरानी करनी चाहिए। आवश्यकता के अनुसार हाथ से निराई-गुड़ाई करके खेत को साफ रखा जा सकता है।
20 से 25 दिन बाद पहली गुड़ाई
पहली निराई-गुड़ाई बुवाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर दूसरी गुड़ाई लगभग 40 से 45 दिन बाद की जा सकती है। हालांकि वास्तविक समय खेत में खरपतवार की स्थिति और फसल की बढ़वार देखकर तय करना चाहिए। गुड़ाई करते समय पौधों की जड़ों को नुकसान न पहुंचे, इसका ध्यान रखना जरूरी है।
संतुलित खाद से मजबूत होगी फसल
मेथी की अच्छी बढ़वार के लिए खेत में पर्याप्त जैविक पदार्थ होना जरूरी है। सड़ी हुई गोबर की खाद, कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके साथ मिट्टी की जांच के आधार पर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्वों की संतुलित मात्रा देना चाहिए। जरूरत से अधिक नाइट्रोजन देने से केवल पत्तियों की अत्यधिक बढ़वार हो सकती है और पौधों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
मिट्टी की जांच के आधार पर दें उर्वरक
हर खेत की मिट्टी में पोषक तत्वों की स्थिति अलग होती है। इसलिए एक ही मात्रा सभी खेतों के लिए उपयुक्त नहीं होती। किसान बुवाई से पहले मिट्टी की जांच कराकर उपलब्ध पोषक तत्वों के आधार पर खाद और उर्वरक की मात्रा तय करें। इससे अनावश्यक खर्च कम करने के साथ फसल को संतुलित पोषण दिया जा सकता है।
माहू और जड़ गलन से बचाएं मेथी
मेथी की फसल में माहू जैसे रस चूसक कीट नुकसान पहुंचा सकते हैं। ये कोमल पत्तियों और नई बढ़वार से रस चूसते हैं, जिससे पत्तियां कमजोर और खराब हो सकती हैं। इसके अलावा अधिक नमी और जलभराव की स्थिति में जड़ गलन जैसी समस्या भी दिखाई दे सकती है। खेत की नियमित निगरानी करके शुरुआती स्तर पर समस्या की पहचान करना जरूरी है।
नीम आधारित उपाय अपनाएं
माहू का शुरुआती प्रकोप दिखाई देने पर नीम आधारित तैयारियों का उपयोग किया जा सकता है। प्रभावित पौधों को खेत से निकालकर नष्ट करना भी उपयोगी हो सकता है। यदि कीट या रोग का प्रकोप अधिक हो जाए तो फसल के लिए अनुशंसित नियंत्रण उपाय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार अपनाने चाहिए। विशेष रूप से हरी पत्तियों की फसल में किसी भी रासायनिक दवा के उपयोग से पहले उसकी अनुशंसित मात्रा और प्रतीक्षा अवधि का ध्यान रखना जरूरी है।
30 से 35 दिन में शुरू हो सकती है कटाई
हरी मेथी की फसल सामान्यतः बुवाई के लगभग 30 से 35 दिन बाद पहली कटाई के लिए तैयार हो सकती है। हालांकि कटाई का समय किस्म, मौसम और फसल की बढ़वार पर निर्भर करता है। जब पत्तियां हरी, कोमल और ताजी हों, तब कटाई करने से बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाली मेथी पहुंचाई जा सकती है।
एक ही फसल से कई बार ले सकते हैं पत्तियां
मेथी की पत्तियों की कटाई के बाद उचित परिस्थितियों में पौधों से नई पत्तियां निकल सकती हैं। इस कारण किसान एक ही फसल से एक से अधिक बार पत्तियों की कटाई कर सकते हैं। कटाई करते समय पौधे को पूरी तरह जमीन से उखाड़ने के बजाय ऐसी ऊंचाई पर काटना चाहिए जिससे दोबारा बढ़वार की संभावना बनी रहे।
सही प्रबंधन से बढ़ सकती है किसान की आमदनी
मेथी की खेती कम अवधि में तैयार होने वाली फसल होने के कारण किसानों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकती है। सितंबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर तक उचित समय पर बुवाई, अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी, गुणवत्तापूर्ण बीज, संतुलित पोषण, समय पर सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण से फसल की गुणवत्ता बेहतर की जा सकती है। हरी मेथी की कटाई बाजार की मांग के अनुसार करने से ताजा उपज की बिक्री की जा सकती है। हालांकि पैदावार और मुनाफा क्षेत्र, किस्म, मौसम, खेती की लागत और बाजार भाव पर निर्भर करता है।
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