नई दिल्ली: खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत के कृषि क्षेत्र पर भी दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की कीमतों में तेजी के कारण उर्वरकों की लागत तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो यूरिया और डीएपी जैसे प्रमुख उर्वरकों की कीमतों में और तेज बढ़ोतरी हो सकती है। अनुमान लगाया जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमत 1,000 डॉलर प्रति टन के पार भी जा सकती है, जिससे भारतीय किसानों और सरकार दोनों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।
यूरिया और डीएपी की कीमतों में तेजी के कारण
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण कई देशों में उत्पादन और आपूर्ति प्रभावित हो रही है। मिस्र ने हाल ही में यूरिया करीब 492 डॉलर प्रति टन की दर से खरीदा था, लेकिन सैन्य गतिविधियों के बाद इसकी कीमत बढ़कर लगभग 530 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई। इसी तरह डीएपी की कीमत भी 750 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 1,000 डॉलर प्रति टन तक जाने की आशंका जताई जा रही है। भारत में जल्द ही खरीफ फसलों की बुवाई का मौसम शुरू होने वाला है। इस समय किसानों को बड़ी मात्रा में यूरिया और डीएपी की जरूरत होती है। ऐसे में मांग बढ़ने और आपूर्ति प्रभावित होने से उर्वरकों की कीमतों में तेजी देखी जा रही है।
आयात पर भारत की भारी निर्भरता
भारत अपनी उर्वरक जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। खासकर फॉस्फेट और पोटाश जैसे उर्वरकों के मामले में देश 90 प्रतिशत से अधिक आयात पर निर्भर है। मोरक्को के पास दुनिया का करीब 70 प्रतिशत फॉस्फेट भंडार है, जबकि कनाडा और बेलारूस पोटाश के प्रमुख उत्पादक देश हैं। Fertiliser Association of India के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से दिसंबर 2025-26 के दौरान भारत में यूरिया की बिक्री 3.8 प्रतिशत बढ़कर 31.16 मिलियन टन हो गई, जबकि घरेलू उत्पादन लगभग 3 प्रतिशत घटकर 22.44 मिलियन टन रह गया। इसी अवधि में आयात करीब 85 प्रतिशत बढ़कर 8 मिलियन टन तक पहुंच गया, जिससे स्पष्ट है कि देश को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए विदेशों पर अधिक निर्भर रहना पड़ रहा है।
सरकार के सामने बढ़ती सब्सिडी की चुनौती
यूरिया का आयात भारत में सरकार के नियंत्रण में होता है। पिछले वर्ष जब कई राज्यों में खाद की कमी की खबरें सामने आईं, तो सरकार ने बड़े पैमाने पर आयात का फैसला लिया और विभिन्न एजेंसियों को टेंडर जारी किए। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने से सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ सकता है। चालू वित्त वर्ष में फॉस्फेट और पोटाश उर्वरकों के लिए सब्सिडी का प्रावधान पहले 49,000 करोड़ रुपये रखा गया था, जिसे बाद में बढ़ाकर 60,000 करोड़ रुपये किया गया और फिर घटाकर 54,000 करोड़ रुपये कर दिया गया। इसी तरह यूरिया सब्सिडी में भी कटौती की गई है, जिससे वित्तीय दबाव की आशंका बढ़ रही है।
होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा जोखिम
ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति के लिहाज से Strait of Hormuz बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। भारत को लगभग 55 प्रतिशत एलएनजी इसी रास्ते से मिलती है। वहीं कतर अकेले भारत को करीब 40 प्रतिशत एलएनजी की आपूर्ति करता है। हाल के हमलों और क्षेत्रीय तनाव के कारण इस मार्ग पर जोखिम बढ़ गया है। यदि इस मार्ग पर आवाजाही बाधित होती है, तो गैस और उर्वरकों दोनों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। कुछ अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने भी उस क्षेत्र में अपने परिचालन अस्थायी रूप से रोक दिए हैं, जिससे परिवहन लागत और समय दोनों बढ़ने की आशंका है।
कृषि व्यापार पर संभावित असर
उर्वरक उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तो सल्फर और फॉस्फोरिक एसिड जैसे कच्चे माल की आपूर्ति धीमी हो सकती है। इससे उर्वरक उत्पादन की लागत बढ़ेगी और इसका असर सीधे कृषि लागत पर पड़ेगा। विशेषज्ञों के अनुसार यदि खाद की कीमतें बढ़ती हैं, तो किसानों की खेती की लागत भी बढ़ेगी। हालांकि सरकार की कोशिश है कि किसानों को समय पर पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराए जाएं और कीमतों पर नियंत्रण रखा जाए, लेकिन अंतिम स्थिति काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय हालात पर निर्भर करेगी।
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