नई दिल्ली: देश के कई हिस्सों में धान की फसल एक बार फिर बौनापन रोग की चपेट में आती दिख रही है। यह वही बीमारी है जिसने करीब तीन साल पहले पंजाब में कहर बरपाया था। उस दौरान धान की लगभग सभी किस्मों में 5 से 15 प्रतिशत तक फिजी वायरस (Fiji Virus) का संक्रमण पाया गया था, जिससे न सिर्फ पौधे बौने रह गए थे, बल्कि फसल की पैदावार पर भी बड़ा असर पड़ा था। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के पूर्व निदेशक डॉ. ए.के. सिंह के मुताबिक, यह समस्या फिजी वायरस के कारण होती है, जो धान के पौधों की लंबाई को प्रभावित करता है और उन्हें समय से पहले ही छोटा और कमजोर बना देता है। यह वायरस एक बार फिर किसानों के लिए चिंता का कारण बन गया है।
क्या है फिजी वायरस?
फिजी वायरस एक पौधजनित वायरस है, जो व्हाइट बैकड प्लांट हॉपर (White Backed Plant Hopper – WBPH) नामक कीट द्वारा एक पौधे से दूसरे पौधे में फैलता है। किसान इसे ‘सफेद फुदका’ या ‘चेपा’ के नाम से भी पहचानते हैं। यह कीट संक्रमित पौधों से रस चूसकर वायरस को स्वस्थ पौधों तक पहुंचाता है, जिससे पौधे बौने रह जाते हैं और उनमें दाने भी कम आते हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने इस वायरस की पहचान सदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस (SRBSDV) के रूप में की है, जिसे सामान्य भाषा में फिजी वायरस कहा जाता है। हालांकि राहत की बात यह है कि वैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट किया है कि यह बीमारी बीज जनित नहीं है। यानी संक्रमित पौधों से निकले बीजों को अगले साल उपयोग में लाया जा सकता है।
कैसे करें बचाव?
डॉ. ए.के. सिंह के अनुसार, फिजी वायरस का कोई सीधा इलाज नहीं है। इससे बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है – इसे फैलाने वाले व्हाइट बैकड प्लांट हॉपर (WBPH) कीट का समय पर नियंत्रण। फसल की नियमित निगरानी और कीटनाशकों का संतुलित छिड़काव ही इस बीमारी को फैलने से रोक सकता है। इसके लिए किसान इन दवाओं का उपयोग कर सकते हैं: एसिफेट 75% – 2 मिली प्रति लीटर पानी, ब्यूप्रोफेज़िन 70% – 0.5 मिली प्रति लीटर पानी, डाइनोटेफ्यूरान 20% – 0.5 मिली प्रति लीटर पानी, फ्लोनिकामिड 50% – 1 मिली प्रति 3 लीटर पानी, पाइमेट्रोज़िन 50% – 0.5 मिली प्रति लीटर पानी, सल्फोक्साफ्लोर 21.8% – 0.5 मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर।
इन दवाओं का छिड़काव धान की रोपाई के 12 से 15 दिन के भीतर करना सबसे प्रभावी रहता है। इससे 20 से 25 दिन तक फसल को वायरस से सुरक्षा मिल सकती है। विशेष ध्यान देना चाहिए कि छिड़काव संतुलित मात्रा में और प्रति एकड़ के हिसाब से ही किया जाए।
किसानों को सलाह
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों से अपील की है कि वे अपने खेतों में सफेद फुदका कीट की नियमित जांच करें, जो मुख्यतः धान की निचली सतह पर पाए जाते हैं और वहीं से पौधों में रस चूसकर वायरस फैलाते हैं। समय पर इन पर नियंत्रण न करने से पूरा खेत संक्रमित हो सकता है। फिजी वायरस की वापसी एक बार फिर किसानों के लिए खतरे की घंटी है। ऐसे में सतर्कता और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार कार्रवाई ही इस रोग से बचाव का एकमात्र रास्ता है। किसानों को चाहिए कि वे किसी भी असामान्य लक्षण को हल्के में न लें और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार कीटनाशक दवाओं का सही समय पर और संतुलित प्रयोग करें।
