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जूनोटिक बीमारियां: जानिए इनकी वजह और बचाव के तरीके

zoonotic diseases

नई दिल्ली: कोरोना, इबोला, जीका वायरस, इंफ्लूंजा ए-बी (बर्ड फ्लू), स्वाइन फ्लू और एशियन फ्लू जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारियां पशु-पक्षियों से इंसानों में फैलती हैं। इन बीमारियों के लिए जरूरी नहीं कि इंसान सीधे संक्रमित पशु या पक्षी के संपर्क में आए। कई बार पर्यावरण, हवा, पानी, भोजन या किसी अन्य माध्यम से भी वायरस इंसानों तक पहुंच जाते हैं। एक बार संक्रमण इंसानों में पहुंच जाए, तो ये बीमारियां बहुत तेजी से फैलती हैं और बड़े स्तर पर महामारी का रूप ले लेती हैं। ये जूनोटिक बीमारियां हैं।

क्या होती हैं जूनोटिक बीमारियां (Zoonotic Diseases)

एनिमल एक्सपर्ट के अनुसार पशु-पक्षियों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों को जूनोटिक या जूनोसिस कहा जाता है। आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में पाई जाने वाली करीब 70 प्रतिशत संक्रामक बीमारियां जूनोटिक होती हैं, यानी उनका स्रोत पशु या पक्षी ही होते हैं। कोविड-19 से लेकर इबोला और एवियन इंफ्लूंजा तक, अधिकतर बड़ी महामारियां इसी श्रेणी में आती हैं।

जूनोटिक बीमारियों से निपटने के लिए तीन स्तरों पर तैयारी

जूनोटिक बीमारियों के खतरे को देखते हुए सरकार ने एक विस्तृत योजना के तहत नेशनल, स्टेट और लोकल लेवल पर काम शुरू किया है। इसके तहत महामारी की पहचान, निगरानी और नियंत्रण के लिए संयुक्त टीमें बनाई गई हैं। पशुओं में फैलने वाली बीमारियों की निगरानी के लिए विशेष सर्विलांस सिस्टम तैयार किया गया है, ताकि समय रहते संक्रमण का पता लगाया जा सके।

महामारी फैलने पर संयुक्त रेस्पॉन्स सिस्टम

अगर किसी क्षेत्र में महामारी फैलती है, तो नेशनल और स्टेट लेवल की संयुक्त टीमें तुरंत रेस्पॉन्स करेंगी। मिशन के रेग्यूलेटरी सिस्टम को मजबूत किया जा रहा है, जिससे बीमारी के फैलने से पहले ही जरूरी कदम उठाए जा सकें। इसके साथ ही लोगों को समय पर चेतावनी देने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किया जा रहा है।

NDMA के साथ मिलकर जोखिम कम करने की रणनीति

नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) के सहयोग से महामारी की गंभीरता को कम करने पर काम किया जा रहा है। प्राथमिक रोगों के टीके, इलाज और दवाओं के विकास के लिए रिसर्च तय की गई है। इसके अलावा तय समय में बीमारी की पहचान, जीनोमिक सर्विलांस और पर्यावरण निगरानी के लिए वैज्ञानिक फार्मूले तैयार किए जा रहे हैं।

क्यों शुरू किया गया NOHM मिशन

कोविड-19, स्वाइन फ्लू, एवियन इंफ्लूंजा, इबोला और जीका वायरस जैसी बीमारियों के बढ़ते खतरे को देखते हुए NOHM मिशन शुरू किया गया है। ये सभी बीमारियां जूनोटिक कैटेगरी में आती हैं और अधिकतर मामलों में पशु-पक्षियों से इंसानों में फैली हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार जंगलों में करीब 17 लाख तरह के वायरस मौजूद हैं, जिनमें से बड़ी संख्या जूनोटिक बीमारियों से जुड़ी हुई है।

चौंकाने वाले वैश्विक आंकड़े

विश्व स्तर पर हर साल जूनोटिक बीमारियों के करीब 100 करोड़ मामले सामने आते हैं। इन बीमारियों की वजह से हर साल लगभग 10 लाख लोगों की मौत हो जाती है। इन्हीं खतरनाक आंकड़ों को देखते हुए दुनिया भर में जूनोटिक बीमारियों पर काबू पाने के लिए बड़े स्तर पर प्रयास शुरू हो चुके हैं।

सिर्फ पशुपालक नहीं, आम इंसान भी जिम्मेदार

सरकार जूनोटिक बीमारियों पर काम भी कर रही है और इन पर खुलकर चर्चा भी हो रही है। इस चर्चा में डर के साथ-साथ आम लोगों से जुड़े सवाल भी शामिल हैं। जरूरी नहीं कि सिर्फ पशुपालक ही बायो-सिक्योरिटी का पालन करें, आम इंसान की भूमिका भी उतनी ही अहम है। किसी भी पशु या पक्षी को छूने से पहले और बाद में हाथों को अच्छी तरह सैनिटाइज करना, साफ-सफाई रखना और सतर्क रहना ही जूनोटिक बीमारियों से बचाव का सबसे बड़ा उपाय है।

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