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पंजाब-हरियाणा आगे, बिहार में गेहूं खरीद क्यों पिछड़ी

wheat procurement Bihar vs Punjab

नई दिल्ली: देश में गेहूं खरीद का मौसम अपने चरम पर है और सरकारी एजेंसियां किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद कर रही हैं। इस बार भी पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्य सरकारी खरीद में सबसे आगे हैं, जबकि बिहार जैसे बड़े कृषि राज्य में खरीद का आंकड़ा बेहद कम बना हुआ है। यह अंतर अब कृषि व्यवस्था और नीतियों पर सवाल खड़े कर रहा है।

पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश में मजबूत खरीद

पंजाब में इस वर्ष लगभग 132 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीद का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें से चार मई तक 115 लाख मीट्रिक टन से अधिक खरीद हो चुकी है। हरियाणा में करीब 75 लाख मीट्रिक टन और मध्य प्रदेश में लगभग 85 लाख मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य तय किया गया है। इन राज्यों में बेहतर मंडी व्यवस्था और सरकारी तंत्र के कारण किसान आसानी से अपनी फसल बेच पा रहे हैं।

बिहार में कम खरीद के मुख्य कारण

बिहार में गेहूं का उत्पादन 60 से 70 लाख मीट्रिक टन के बीच रहता है, जबकि खपत भी लगभग 50 से 60 लाख मीट्रिक टन तक होती है। इसका मतलब है कि यहां पैदा होने वाला अधिकांश गेहूं स्थानीय स्तर पर ही खप जाता है। इसके अलावा राज्य में सरकारी खरीद कम होने का एक बड़ा कारण कमजोर बाजार व्यवस्था है।

मंडी व्यवस्था खत्म होने का असर

साल 2006 में राज्य में मंडी व्यवस्था समाप्त कर दी गई थी, जिसके बाद किसानों के लिए संगठित बाजार की कमी हो गई। अब अधिकांश किसान अपनी फसल स्थानीय व्यापारियों या बिचौलियों को बेचने को मजबूर हैं, जिससे उन्हें अक्सर न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत मिलती है।

किसानों को कई तरह की दिक्कतें

बिहार के किसानों को खरीद प्रक्रिया में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। गांवों के पास खरीद केंद्रों की कमी, देर से शुरू होने वाली खरीद प्रक्रिया, पंजीकरण की जटिलता और भंडारण की कमजोर व्यवस्था जैसी समस्याएं प्रमुख हैं। इसके अलावा परिवहन की कमी और बिचौलियों का दबदबा भी किसानों की आय को प्रभावित करता है।

सफल मॉडल से सीख की जरूरत

पंजाब और हरियाणा में वर्षों से मजबूत बाजार नेटवर्क विकसित किया गया है, जहां गांवों के पास ही खरीद केंद्र उपलब्ध हैं और भुगतान समय पर किया जाता है। मध्य प्रदेश ने भी हाल के वर्षों में अपनी खरीद व्यवस्था को मजबूत किया है, जिससे वहां सरकारी खरीद में बढ़ोतरी हुई है।

सुधार की संभावनाएं

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बिहार में मजबूत बाजार ढांचा तैयार किया जाए, खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी मिले, तो राज्य में भी सरकारी खरीद बढ़ सकती है। इससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा और सरकारी भंडारण व्यवस्था भी मजबूत होगी।

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