कृषि पिटारा

पराली समस्या का समाधान, सस्ती जैविक तकनीक से बनेगी खाद

stubble management solution technology

लखनऊ: लखनऊ स्थित केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने वर्षों की मेहनत के बाद किसानों की एक बड़ी समस्या का समाधान खोज लिया है। धान, मक्का और गन्ने जैसी फसलों के अवशेषों को नष्ट करने की समस्या से जूझ रहे किसानों के लिए अब एक खास जैविक घोल तैयार किया गया है, जो पराली को कम समय में खाद में बदल देता है। इस नई तकनीक से पराली जलाने की आवश्यकता समाप्त होने की उम्मीद जताई जा रही है, जिससे पर्यावरण संरक्षण को भी बड़ा लाभ मिलेगा।

तीन हफ्ते में पराली बनेगी खाद

संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार यह विशेष घोल एक खास प्रकार के कवक के मिश्रण से बनाया गया है। जहां सामान्य परिस्थितियों में फसल अवशेषों को खाद बनने में दो से तीन महीने लग जाते हैं, वहीं इस घोल के उपयोग से यह प्रक्रिया मात्र तीन सप्ताह में पूरी हो जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह तकनीक पारंपरिक तरीकों की तुलना में अधिक प्रभावी है और अवशेषों को तेजी से मिट्टी में मिलाकर उसे उपजाऊ बनाती है।

कम लागत में बड़ा समाधान

इस जैविक घोल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम लागत और सरल उपयोग है। एक लीटर घोल की कीमत लगभग 150 रुपये रखी गई है। इसे 200 लीटर पानी में मिलाकर एक एकड़ खेत में छिड़काव किया जा सकता है। इस प्रकार बहुत कम खर्च में पूरे खेत की पराली को खाद में बदला जा सकता है, जो किसानों के लिए आर्थिक रूप से भी लाभकारी है।

मिट्टी की उर्वरता और पैदावार में बढ़ोतरी

वैज्ञानिकों का दावा है कि इस घोल से तैयार होने वाली जैविक खाद मिट्टी की गुणवत्ता को बेहतर बनाती है। इससे मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ती है और उसकी उर्वरता मजबूत होती है। लगातार उपयोग से फसलों की पैदावार में 12 से 15 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई है। यह तकनीक धान, गेहूं और गन्ने समेत विभिन्न फसलों के अवशेषों पर प्रभावी साबित हुई है।

किसानों तक पहुंचाने की तैयारी

इस नई तकनीक को किसानों तक पहुंचाने के लिए प्रयास तेज कर दिए गए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इस उत्पाद को पेटेंट कराने की प्रक्रिया जारी है और जल्द ही इसे कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों तक उपलब्ध कराया जाएगा। इससे न केवल पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाया जा सकेगा, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि होगी।

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