नई दिल्ली: मई से जून के बीच का समय किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इस दौरान खेत अक्सर खाली हो जाते हैं। रबी और खरीफ फसलों की कटाई के बाद यह सही अवसर होता है जब किसान अपनी जमीन की सेहत का आकलन कर सकते हैं। लगातार खेती करने से मिट्टी के पोषक तत्व कम हो जाते हैं, जिससे उत्पादन पर असर पड़ता है। ऐसे में बेहतर पैदावार के लिए मिट्टी जांच कराना बेहद जरूरी हो जाता है।
बिना जांच के खाद डालना बन सकता है नुकसान का कारण
विशेषज्ञों के अनुसार बिना जानकारी के रासायनिक खाद और उर्वरकों का अंधाधुंध इस्तेमाल किसानों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। इससे लागत तो बढ़ती ही है, साथ ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी धीरे-धीरे कमजोर हो जाती है। इसके बजाय एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक अपनाकर और मिट्टी की जरूरत के अनुसार खाद का उपयोग करने से उत्पादन बेहतर होता है और मिट्टी की गुणवत्ता भी बनी रहती है।
मई-जून में मिट्टी जांच का सही समय
आज के समय में सरकारी प्रयोगशालाओं के अलावा निजी और सहकारी संस्थाएं भी मिट्टी जांच की सुविधा दे रही हैं। इस जांच के जरिए मिट्टी का पीएच स्तर, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश के साथ-साथ जिंक और आयरन जैसे सूक्ष्म तत्वों की जानकारी मिलती है। इससे किसान यह तय कर पाते हैं कि खेत में किस तत्व की कमी है और किसकी अधिकता।
सही तरीके से लें मिट्टी का नमूना
विशेषज्ञों के अनुसार एक एकड़ खेत में 10 से 15 अलग-अलग स्थानों से मिट्टी का नमूना लेना चाहिए। इसके लिए खेत में जिग-जैग तरीके से स्थान चुनें, ताकि कोई भी हिस्सा छूट न जाए। ध्यान रखें कि खड़ी फसल वाले खेत या हाल ही में खाद डाले गए खेत से नमूना न लें।
नमूना लेते समय जमीन की ऊपरी परत हटाकर करीब 6 इंच गहराई तक ‘वी’ आकार का गड्ढा खोदें और एक तरफ से 2-3 सेंटीमीटर मोटी मिट्टी की परत निकालकर साफ बर्तन में जमा करें।
आधा किलो मिट्टी बताएगी पूरे खेत की स्थिति
10-15 स्थानों से ली गई मिट्टी को अच्छी तरह मिलाकर चार हिस्सों में बांट लें और दो हिस्सों को हटा दें। बाकी मिट्टी को फिर मिलाकर यही प्रक्रिया दोहराएं, जब तक लगभग आधा किलो मिट्टी न बच जाए। यही नमूना पूरे खेत की स्थिति को दर्शाता है। इसे साफ थैली में भरकर किसान अपना नाम, पता, मोबाइल नंबर और खेत की जानकारी लिखकर जांच के लिए भेज सकते हैं।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड से मिलेगी पूरी जानकारी
सरकार द्वारा जारी मृदा स्वास्थ्य कार्ड में मिट्टी की गुणवत्ता और जरूरी सुधार के उपाय दर्ज होते हैं। इसके आधार पर किसान सही फसल का चयन कर सकते हैं और बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि हर तीन से चार साल में मिट्टी की जांच जरूर करानी चाहिए, ताकि जमीन की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहे। मिट्टी की नियमित जांच न केवल उत्पादन बढ़ाने में मदद करती है, बल्कि किसानों को अनावश्यक खर्च से भी बचाती है। स्वस्थ मिट्टी ही बेहतर खेती और समृद्ध किसान की नींव होती है।
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