विशेष लेख

रसायन कम करें, जैविक शक्ति से फसल बचाएँ

Reduce chemicals

पूसा, समस्तीपुर: खेती में फफूंद, जीवाणु, विषाणु और सूत्रकृमियों से होने वाली बीमारियाँ उत्पादन और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करती हैं। खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार पौध-कीट एवं रोगों के कारण विश्व में प्रतिवर्ष 20–40 प्रतिशत तक फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है। जुलाई 2026 में FAO ने पौध स्वास्थ्य को ‘वन हेल्थ’ यानी मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य से जोड़ते हुए समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन, निगरानी और जिम्मेदार कीटनाशी उपयोग पर फिर जोर दिया है। इसलिए भविष्य की खेती का लक्ष्य केवल बीमारी आने के बाद दवा छिड़कना नहीं, बल्कि ऐसा स्वस्थ कृषि-पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है जिसमें रोगजनक को पनपने का कम अवसर मिले। “रसायन नहीं, प्रकृति से सुरक्षा” का अर्थ यह भी नहीं कि प्रत्येक परिस्थिति में रसायनों को पूर्णतः त्याग दिया जाए; इसका वैज्ञानिक अर्थ है—रोकथाम को प्राथमिकता, जैविक एवं प्राकृतिक विकल्पों का अधिकतम उपयोग और आवश्यकता होने पर ही पंजीकृत रसायनों का विवेकपूर्ण प्रयोग।

जैव-नियंत्रक: प्रकृति के अपने रोग-रक्षक

ट्राइकोडर्मा हार्जियानम, ट्राइकोडर्मा विरिडे, बैसिलस सबटिलिस, स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस, पोकोनिया क्लैमाइडोस्पोरिया जैसे लाभकारी सूक्ष्मजीव आज पौध रोग प्रबंधन के प्रमुख जैविक साधन हैं। ये रोगजनकों से भोजन और स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, प्रतिजैविक पदार्थ एवं एंजाइम बनाते हैं तथा पौधों की प्राकृतिक प्रतिरक्षा को सक्रिय कर सकते हैं। ICAR की 2025 खरीफ कृषि सलाहों में भी विभिन्न फसलों में Trichoderma तथा Pseudomonas जैसे जैव-नियंत्रकों को मृदा एवं जड़-क्षेत्र के रोग प्रबंधन में शामिल किया गया है। भारत के कृषि मंत्रालय से संबद्ध नवीन आंकड़ों में 2024–25 के दौरान तकनीकी ग्रेड में एजाडिरैक्टिन 200.788 टन, Bacillus subtilis 92.8 टन तथा Beauveria bassiana 302.32 टन उपयोग दर्ज है, जो जैव-आधारित फसल सुरक्षा की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।

फसल चक्र से तोड़ें रोगजनक का जीवन-चक्र

एक ही खेत में लगातार एक ही फसल उगाने से मिट्टी में विशिष्ट रोगजनकों की संख्या बढ़ सकती है। रोग के गैर-पोषक पौधों को फसल चक्र में शामिल करने से कई मृदाजनित रोगों और सूत्रकृमियों का दबाव घटाया जा सकता है। हालांकि फसल चक्र रोगजनक की जैविकी के अनुसार बनाया जाना चाहिए, क्योंकि कुछ रोगजनकों के पोषक पौधों की संख्या बहुत अधिक होती है।

सहफसल और जैव-विविधता बन सकती है सुरक्षा कवच

उचित सहफसली खेती खेत की जैव-विविधता बढ़ाती है। गेंदा (Tagetes spp.) की कुछ प्रजातियाँ एवं किस्में कुछ जड़-गाँठ सूत्रकृमियों की आबादी घटाने में उपयोगी हो सकती हैं। दलहनी फसलें राइजोबियम जीवाणुओं की सहायता से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती हैं और फसल प्रणाली को अधिक टिकाऊ बनाती हैं। लेकिन सहफसल का चुनाव मुख्य फसल और रोगजनक को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए।

स्वस्थ मिट्टी में रोग का दबाव कम

मृदा केवल पौधे को खड़ा रखने का माध्यम नहीं, बल्कि करोड़ों लाभकारी सूक्ष्मजीवों का जीवित संसार है। अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी-कम्पोस्ट, हरी खाद, फसल-अवशेषों का वैज्ञानिक प्रबंधन, नीम खली तथा आवरण फसलें मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ एवं सूक्ष्मजीव विविधता बढ़ाने में सहायता करती हैं।

जल निकास भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। लंबे समय तक जलभराव रहने पर Phytophthora, Pythium तथा अनेक जड़ एवं कॉलर सड़न रोग तेजी से बढ़ सकते हैं।

प्रतिरोधी किस्म—सबसे सस्ता और सुरक्षित उपाय

जहाँ उपलब्ध हों, रोग-प्रतिरोधी या सहनशील किस्मों का चुनाव रोग प्रबंधन की सबसे प्रभावी रणनीतियों में से एक है। प्रमाणित एवं रोगमुक्त बीज, पौध या ऊतक-संवर्धित रोपण सामग्री से शुरुआत करने पर रोग खेत तक पहुँचने से पहले ही रोका जा सकता है। आधुनिक पादप प्रजनन में आणविक चयन, जीनोमिक चयन और जीन-संपादन जैसी तकनीकें भी रोग-प्रतिरोध विकसित करने की संभावनाएँ बढ़ा रही हैं। किंतु आनुवंशिक रूप से परिवर्तित या जीन-संपादित सामग्री का उपयोग केवल संबंधित सरकारी नियमों एवं अनुमोदन के अनुसार ही किया जाना चाहिए।

वनस्पति अर्क उपयोगी, लेकिन हर घरेलू नुस्खा वैज्ञानिक नहीं

नीम से प्राप्त एजाडिरैक्टिन, कुछ आवश्यक तेल तथा अन्य वनस्पति-आधारित पदार्थ कीट एवं कुछ रोगजनकों के विरुद्ध उपयोगी हो सकते हैं। लहसुन जैसे अर्कों पर भी शोध हुआ है, लेकिन घरेलू रूप से तैयार मिश्रण की सांद्रता और प्रभावशीलता हमेशा समान नहीं रहती। इसलिए जहाँ उपलब्ध हों, पंजीकृत और मानकीकृत जैव-उत्पादों को प्राथमिकता देना अधिक सुरक्षित है।

विषाणु रोगों में जाल और बाधाएँ विशेष उपयोगी

विषाणु रोगों को अक्सर सफेद मक्खी, माहू, थ्रिप्स और अन्य वाहक कीट फैलाते हैं। पीले या नीले चिपचिपे जाल, कीटरोधी जाली, पंक्ति आवरण, स्वस्थ पौध सामग्री, रोगग्रस्त पौधों को समय पर हटाना तथा आवश्यकतानुसार परावर्तक मल्च जैसे उपाय वाहक कीटों के दबाव को घटा सकते हैं। ध्यान रहे, चिपचिपे जाल विषाणु से संक्रमित पौधे को ठीक नहीं करते; वे मुख्यतः वाहक कीटों की निगरानी एवं संख्या कम करने में सहायक हैं।

खेती की छोटी-छोटी बातें भी रोकती हैं बीमारी

सही दूरी, उचित पौध संख्या, संतुलित नाइट्रोजन, समय पर सिंचाई, अच्छा जल निकास, रोगग्रस्त अवशेष हटाना, संक्रमित शाखाओं की छंटाई और कृषि औजारों की स्वच्छता रोग प्रबंधन के अत्यंत प्रभावी उपाय हैं। बहुत घनी फसल में नमी अधिक समय तक बनी रहती है, जिससे कई पत्ती एवं फल रोग बढ़ सकते हैं।

जैव-उत्तेजक और माइक्रोबियल कंसोर्टिया—नई दिशा

समुद्री शैवाल अर्क, ह्यूमिक पदार्थ और चयनित लाभकारी सूक्ष्मजीवों पर आधारित जैव-उत्तेजकों का प्रयोग पौधे की जड़ वृद्धि, पोषक तत्व उपयोग तथा प्रतिकूल परिस्थितियों को सहने की क्षमता बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। एकल सूक्ष्मजीव के स्थान पर अनुकूल सूक्ष्मजीवों के बहु-सदस्यीय कंसोर्टिया पर भी शोध तेजी से बढ़ रहा है। हालांकि इन्हें रोग की पक्की दवा मानने के बजाय समेकित प्रबंधन का सहायक घटक समझना चाहिए।

भारत भी बढ़ रहा है प्राकृतिक खेती की ओर

राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत सरकार ने ₹2,481 करोड़ के परिव्यय के साथ लगभग 1 करोड़ किसानों तक पहुँचने, 7.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, 15,000 समूह विकसित करने तथा 10,000 जैव-इनपुट संसाधन केंद्र स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। यह बदलाव बताता है कि कम बाहरी निवेश, बेहतर मिट्टी स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी-आधारित खेती अब राष्ट्रीय कृषि रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही है।

एकीकृत रोग प्रबंधन ही सबसे व्यावहारिक रास्ता

किसी एक जैविक उत्पाद, वनस्पति अर्क या तकनीक से हर रोग का समाधान संभव नहीं है। सर्वश्रेष्ठ परिणाम तब मिलते हैं जब प्रतिरोधी किस्म + स्वस्थ बीज/पौध + फसल चक्र + जैव-नियंत्रक + जैविक मृदा सुधार + उचित दूरी एवं जल निकास + नियमित निगरानी को एक साथ अपनाया जाए। आवश्यकता पड़ने पर रोग की सही पहचान के बाद ही पंजीकृत रसायन को अंतिम विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

इस प्रकार भविष्य का पौध संरक्षण “केवल दवा आधारित” नहीं, बल्कि जीवित मिट्टी, स्वस्थ पौधा, लाभकारी सूक्ष्मजीव, जैव-विविधता और समय पर रोग पहचान पर आधारित होगा। प्रकृति को खेत का सहयोगी बनाकर हम उत्पादन बनाए रखते हुए रासायनिक निर्भरता और पर्यावरणीय दबाव दोनों को कम कर सकते हैं।

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार मेरे व्यक्तिगत वैज्ञानिक एवं शैक्षणिक दृष्टिकोण हैं। इनका मेरे संस्थान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, अथवा किसी सरकारी संस्था की आधिकारिक राय या नीति से कोई संबंध नहीं है। यह लेख केवल कृषि शिक्षा, जन-जागरूकता और जनहित के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है; इसमें किसी उत्पाद, संस्था या व्यावसायिक हित का प्रचार अथवा अनुशंसा नहीं की गई है। इसे प्रकाशित करने के पीछे मेरे व प्रकाशक संस्था (कृषि पिटारा) के मध्य किसी भी प्रकार का कोई आर्थिक या अन्य हित संबद्ध नहीं है।

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