पूसा, समस्तीपुर: लहसुन भारतीय रसोई का केवल मसाला नहीं, बल्कि किसान की आय, मसाला अर्थव्यवस्था, पोषण और पारंपरिक स्वास्थ्य-ज्ञान से जुड़ी महत्वपूर्ण फसल है। ऐसे में प्रतिबंधित चाइनीज़ लहसुन का अवैध रूप से भारतीय बाजार में पहुँचना केवल सस्ते आयात या व्यापार का प्रश्न नहीं है; यह पादप जैव-सुरक्षा, वैध व्यापार, उपभोक्ता सुरक्षा और भारतीय किसानों के हित से जुड़ा विषय है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है। भारत में चीन से लहसुन के आयात पर रोक 2014 से नहीं, बल्कि 6 सितंबर 2005 से लागू है। लोकसभा में 1 अप्रैल 2025 को दिए गए आधिकारिक उत्तर के अनुसार चीन से आने वाली लहसुन की खेपों में संगरोध-महत्त्व के कवक Embellisia alli तथा Urocystis cepulae बार-बार पाए जाने के बाद यह रोक लगाई गई थी। कृषि उत्पादों का आयात पादप संगरोध (भारत में आयात का विनियमन) आदेश, 2003 के अंतर्गत नियंत्रित किया जाता है।
रोक के बावजूद बड़ी जब्ती चिंता का विषय
सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी इस समस्या की गंभीरता बताती है। सीमा शुल्क विभाग और राजस्व खुफिया निदेशालय ने 2023-24 में 546 मीट्रिक टन तथा 2024-25 में 507 मीट्रिक टन चीनी लहसुन जब्त किया। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण को चेन्नई के बाजारों में चीनी लहसुन बिकने की शिकायत भी मिली, जिसके बाद तमिलनाडु खाद्य सुरक्षा विभाग को निगरानी बढ़ाने को कहा गया। सभी पादप संगरोध केंद्रों को भी अवैध आयात रोकने के निर्देश दिए गए। ये आँकड़े बताते हैं कि प्रतिबंध के दो दशक बाद भी अवैध आवक का जोखिम समाप्त नहीं हुआ है। इसलिए केवल सीमा पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं; थोक व्यापारियों, खुदरा विक्रेताओं और उपभोक्ताओं की जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है।
असली खतरा है—जैव-सुरक्षा
चीन से लहसुन पर रोक का सबसे मजबूत वैज्ञानिक आधार पादप स्वास्थ्य है। किसी विदेशी कृषि उत्पाद के साथ नया कीट, रोगजनक, खरपतवार बीज या अन्य संगरोध जीव देश में प्रवेश कर जाए तो बाद में उसका उन्मूलन अत्यंत कठिन और महँगा हो सकता है। यही कारण है कि आयात से पहले कीट-जोखिम विश्लेषण और पादप-स्वच्छता प्रमाणन आवश्यक है।
यदि प्रतिबंधित लहसुन अनधिकृत मार्गों से आता है, तो वह नियमित पादप संगरोध परीक्षण, सीमा शुल्क जाँच और खाद्य-सुरक्षा निगरानी से बच सकता है। इससे भारतीय लहसुन, प्याज तथा अन्य Allium फसलों के लिए अनावश्यक जैव-सुरक्षा जोखिम उत्पन्न हो सकता है। यही वह पक्ष है जिसे उपभोक्ता तक पहुँचाना सबसे जरूरी है।
भारतीय लहसुन की ताकत—उत्पादन में तेज बढ़ोतरी
भारत स्वयं लहसुन का बड़ा उत्पादक है और नवीनतम आँकड़े उत्साहजनक हैं। सुपारी एवं मसाला विकास निदेशालय के 2025-26 के द्वितीय अग्रिम अनुमान के अनुसार देश में लहसुन का क्षेत्र लगभग 4.50 लाख हेक्टेयर और उत्पादन लगभग 38.09 लाख टन रहने का अनुमान है। 2024-25 के अंतिम अनुमान में क्षेत्र लगभग 4.19 लाख हेक्टेयर और उत्पादन 35.65 लाख टन था। अर्थात उत्पादन में लगभग 6.8 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है। यह स्थिति बताती है कि गुणवत्तापूर्ण बीज, बेहतर भंडारण, प्रसंस्करण, किसान उत्पादक संगठनों, आधुनिक विपणन और निर्यात शृंखला पर ध्यान दिया जाए तो भारत घरेलू मांग पूरी करने के साथ वैश्विक बाजार में अपनी उपस्थिति और मजबूत कर सकता है।
लहसुन स्वास्थ्यवर्धक है, लेकिन तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर न कहें
लहसुन में एलिन, एलिसिन, एस-एलाइल सिस्टीन तथा अन्य कार्बनिक सल्फर यौगिक पाए जाते हैं। लहसुन को काटने या कुचलने पर एलिन और एलिनेज एंजाइम की क्रिया से एलिसिन बनता है, जो इसकी विशिष्ट तीखी गंध और अनेक जैव सक्रिय गुणों से जुड़ा है। वर्ष 2025 की एक वैज्ञानिक समीक्षा में लहसुन के सल्फर यौगिकों के एंटीऑक्सीडेंट तथा हृदय एवं चयापचय स्वास्थ्य से संबंधित संभावित लाभों का उल्लेख किया गया है।
लेकिन यह दावा करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा कि हर चीनी लहसुन में अत्यधिक कीटनाशक होता है, वह कैंसर पैदा करता है या भारतीय लहसुन की तुलना में निश्चित रूप से कम पौष्टिक होता है। भारत द्वारा लगाया गया प्रतिबंध मुख्यतः संगरोध-महत्त्व के रोगजनकों के कारण है। इसी प्रकार भारतीय लहसुन भी केवल भारतीय होने के कारण स्वतः “रसायन-मुक्त” नहीं माना जा सकता। सुरक्षा खेती की पद्धति, अवशेष स्तर, भंडारण और आपूर्ति शृंखला पर निर्भर करती है। अमेरिकी राष्ट्रीय पूरक एवं समेकित स्वास्थ्य केंद्र भी लहसुन के कुछ संभावित स्वास्थ्य लाभों को स्वीकार करता है, किंतु कई रोगों की रोकथाम संबंधी अतिरंजित दावों के लिए प्रमाण सीमित बताता है।
क्या देखकर चीनी और भारतीय लहसुन पहचान सकते हैं?
बाजार में अक्सर कहा जाता है कि बहुत बड़ा, अत्यधिक सफेद, साफ जड़ वाला या समान आकार का लहसुन चीनी होता है, जबकि छोटा, अधिक तीखा और हल्के गुलाबी अथवा भूरे छिलके वाला भारतीय। ये संकेत कभी-कभी उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन सिर्फ आकार, रंग या तीखेपन के आधार पर मूल देश की निश्चित पहचान संभव नहीं है, क्योंकि भारत में भी अनेक किस्में और आकार पाए जाते हैं। इसलिए उपभोक्ता विश्वसनीय विक्रेता से खरीदें, पैक उत्पाद पर मूल स्थान, विक्रेता और खाद्य-सुरक्षा संबंधी विवरण देखें तथा असामान्य रूप से संदिग्ध माल मिलने पर स्थानीय खाद्य सुरक्षा अथवा संबंधित प्रशासनिक अधिकारी को सूचना दें।
‘भारतीय लहसुन को हाँ’ का अर्थ केवल राष्ट्रभावना नहीं
स्वदेशी लहसुन खरीदने का अर्थ भारतीय किसान की आय, रोजगार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, वैध आपूर्ति शृंखला और देश की जैव-सुरक्षा को समर्थन देना है। उपभोक्ता जब स्थानीय और पता लगाने योग्य स्रोत से लहसुन खरीदता है तो उसका पैसा सीधे देश की कृषि मूल्य-शृंखला को मजबूत करता है।
इसलिए संदेश स्पष्ट होना चाहिए—प्रतिबंधित और अवैध चीनी लहसुन को ना कहें; सुरक्षित, पता लगाने योग्य और गुणवत्तापूर्ण भारतीय लहसुन को प्राथमिकता दें। यह केवल “विदेशी बनाम स्वदेशी” की बहस नहीं, बल्कि किसान हित, खाद्य सुरक्षा और भारत की कृषि जैव-सुरक्षा की साझा जिम्मेदारी है।
अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार मेरे व्यक्तिगत वैज्ञानिक एवं शैक्षणिक दृष्टिकोण हैं। इनका मेरे संस्थान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, अथवा किसी सरकारी संस्था की आधिकारिक राय या नीति से कोई संबंध नहीं है। यह लेख केवल कृषि शिक्षा, जन-जागरूकता और जनहित के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है; इसमें किसी उत्पाद, संस्था या व्यावसायिक हित का प्रचार अथवा अनुशंसा नहीं की गई है। इसे प्रकाशित करने के पीछे मेरे व प्रकाशक संस्था (कृषि पिटारा) के मध्य किसी भी प्रकार का कोई आर्थिक या अन्य हित संबद्ध नहीं है।
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