नई दिल्ली: कपास की खेती करने वाले किसानों के लिए इन दिनों सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवॉर्म)। यह छोटा सा कीट खेतों में ऐसी तबाही मचा रहा है कि महंगे कीटनाशकों का बार-बार छिड़काव करने के बावजूद किसान इसे काबू में नहीं कर पा रहे। वजह यह है कि यह कीट कपास के बॉल यानी फलियों के अंदर घुसकर बीज और रेशों को नष्ट कर देता है, जिससे पूरी की पूरी फसल चौपट हो जाती है। यही कारण है कि गुलाबी सुंडी किसानों के लिए एक बुरे सपने की तरह बन गई है।
गुलाबी सुंडी एक खास तरह का कीट है जो रात के समय ज्यादा सक्रिय रहता है और नमी वाले मौसम में तेजी से पनपता है। प्रौढ़ अवस्था में इसका रंग गहरा भूरा होता है, जो बाद में गुलाबी में बदल जाता है। यह फसल की अंतिम अवस्था तक बना रहता है और शुरुआती दौर में ही छोटे बॉल में घुसकर बीजों को खा जाता है। इसके बाद यह बॉल में बने छेद को अपने मल से बंद कर देता है, जिससे उस पर किसी भी कीटनाशक का असर नहीं होता। गुलाबी सुंडी के प्रकोप का सबसे बड़ा संकेत बॉल पर छोटे-छोटे छेद, समय से पहले बॉल का सूखकर गिर जाना और अंदर के बीजों का काला पड़ जाना है। कई बार बॉल को खोलने पर गुलाबी रंग के छोटे लार्वा भी देखे जा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे ही फसल में गुलाबी सुंडी का पता चले, तुरंत कीटनाशकों का छिड़काव करना जरूरी है। किसान प्रोपेक्स सुपर और अमृत गोल्ड नीम का मिश्रण कपास के फूल और पत्ती अवस्था में छिड़क सकते हैं। जैविक नियंत्रण के लिए नीम का तेल और डिटर्जेंट पाउडर को प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना भी असरदार माना जाता है। फसल की नियमित निगरानी और समय पर उपचार से नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
तकनीक भी अब गुलाबी सुंडी से निपटने में किसानों की मदद कर रही है। खासतौर पर आई ट्रैपर लाइट ट्रैप मशीन किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। यह मशीन सिर्फ हानिकारक कीटों को मारती है और फायदेमंद कीटों को नुकसान नहीं पहुंचाती। इससे गुलाबी सुंडी के साथ-साथ अन्य हानिकारक कीट भी नियंत्रित होते हैं, जिससे उत्पादन बढ़ता है और कीटनाशक पर होने वाला खर्च घटता है। विशेषज्ञों का कहना है कि रासायनिक और जैविक उपायों के साथ आई ट्रैपर जैसी आधुनिक तकनीक अपनाकर किसान अपनी कपास की फसल को गुलाबी सुंडी के प्रकोप से बचा सकते हैं और अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
