पंजाब में पिछले 8 दिनों में पराली जलाने की 39 घटनाएं सामने आई हैं। लेकिन इस बार पराली जलाने पर सरकार सख्त है। इसके लिए 14 किसानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। हर साल अक्टूबर और नवंबर में धान की कटाई के बाद पराली जलाने से दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण बढ़ जाता है। सरकार इस बार और सख्ती बरत रही है।
सरकारी नीतियों में विरोधाभास
किसानों का कहना है कि सरकार की नीतियां विरोधाभासी हैं। एक तरफ बाढ़ से फसल नुकसान पर किसानों को 20 हजार रुपये प्रति एकड़ मुआवजा देने का ऐलान हुआ है, वहीं पराली जलाने पर 30 हजार रुपये तक का जुर्माना और एफआईआर दर्ज की जा रही है। किसानों का आरोप है कि सरकार उन्हें राहत देने की बजाय दोहरी मार कर रही है।
जुर्माना दोगुना, कानूनी कार्रवाई भी
2024 के गजट नोटिफिकेशन के बाद से पराली जलाने पर जुर्माना दोगुना कर दिया गया है। अब 2 एकड़ तक 5,000 रुपये, 5 एकड़ तक 10,000 रुपये और 5 एकड़ से ज्यादा पर 30,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। इसके अलावा किसानों पर एफआईआर और सरकार के डेटाबेस में रेड एंट्री की जाएगी, जिससे वे अपनी जमीन पर लोन या बिक्री नहीं कर सकेंगे।
पिछले सालों में पराली जलाने की घटनाएं घटीं
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पराली जलाने की घटनाएं साल दर साल घट रही हैं। 2024 में 10,909 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2023 में यह संख्या 36,663 थी, यानी लगभग 70% की कमी। 2022 में 49,922, 2021 में 71,304 और 2020 में 76,590 घटनाएं हुई थीं। इसके बावजूद किसानों का कहना है कि उन पर अनुचित दबाव बनाया जा रहा है।
सरकार का भूला हुआ वादा
9 दिसंबर 2021 को तत्कालीन कृषि सचिव संजय अग्रवाल ने किसानों को पत्र लिखकर पराली जलाने पर क्रिमिनल जिम्मेदारी से छूट देने का वादा किया था। लेकिन इस साल भी पराली जलाने वाले किसानों पर एफआईआर दर्ज करने में सरकार पीछे नहीं हटी।
एफआईआर और जुर्माने की कार्रवाई
पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) के अनुसार, अमृतसर समेत कई जिलों में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 223 के तहत 14 एफआईआर दर्ज हुई हैं। किसानों पर पर्यावरण क्षतिपूर्ति के रूप में 1.25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है, जिसमें से 50,000 रुपये वसूले भी जा चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
17 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार से पूछा कि क्यों न पराली जलाने वाले किसानों को गिरफ्तार किया जाए ताकि एक सख्त संदेश दिया जा सके। कोर्ट ने माना कि वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सख्त कदम जरूरी हैं।
किसानों की मजबूरी
किसानों का कहना है कि पराली जलाना उनकी मजबूरी है। धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच मुश्किल से 20-25 दिन का समय मिलता है। इतने कम समय में पराली का प्रबंधन करना संभव नहीं है। एक एकड़ धान से 25-30 क्विंटल पराली निकलती है, जिसे छोटे किसान इकट्ठा या आधुनिक तरीके से निपटा नहीं सकते। मजबूरन उन्हें खेत जलाने पड़ते हैं।
पराली जलाने पर सरकार की सख्ती और जुर्माने ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। जहां एक ओर प्रदूषण नियंत्रण जरूरी है, वहीं किसानों की समस्याओं का समाधान केवल सजा और जुर्माने से नहीं बल्कि ठोस सरकारी सहयोग और व्यवहारिक विकल्पों से ही संभव है।
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