कटक: केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान ने मध्यम और कम गहरे पानी वाले क्षेत्रों के लिए अधिक पैदावार देने वाली धान की नई किस्म विकसित की है। ‘सीआर धान 501’ नाम की इस किस्म को केंद्रीय किस्म विमोचन समिति ने असम और उत्तर प्रदेश में खेती के लिए जारी किया है। करीब 155 दिन में तैयार होने वाली इस किस्म की औसत पैदावार 4.0 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है। जलजमाव वाले क्षेत्रों में धान की उत्पादकता बढ़ाने के लिए इसे महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
जलजमाव वाले क्षेत्रों के लिए विकसित की गई किस्म
देश में करीब 30 लाख हेक्टेयर धान क्षेत्र ऐसा है, जहां जलजमाव की समस्या बनी रहती है। इनमें बड़ी संख्या तटीय क्षेत्रों की है। अचानक आने वाली बाढ़ और लंबे समय तक पानी जमा रहने के कारण इन क्षेत्रों में धान की फसल को बार-बार पानी में डूबने का सामना करना पड़ता है। कई इलाकों में फसल के मौसम के दौरान लंबे समय तक 25 से 30 सेंटीमीटर तक पानी जमा रहता है। ऐसी परिस्थितियों में सामान्य धान की किस्मों का प्रबंधन मुश्किल हो जाता है और उत्पादन पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।
सीआर धान 501 की पैदावार क्षमता 4 टन
केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक ने मध्यम और कम गहरे पानी वाले क्षेत्रों के लिए ‘सीआर धान 501’ विकसित की है। इसकी अवधि करीब 155 दिन है और औसत पैदावार 4.0 टन प्रति हेक्टेयर तक बताई गई है। इस किस्म को असम और उत्तर प्रदेश के लिए जारी किया गया है। संस्थान ने ओडिशा में समान परिस्थितियों के लिए 11 अन्य धान की किस्में भी जारी की हैं। इनकी पैदावार क्षमता 3.0 से 4.5 टन प्रति हेक्टेयर के बीच है।
वर्षाधान भी किसानों के बीच लोकप्रिय
केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान की ओर से जारी की गई किस्मों में वर्ष 2005 में जारी ‘वर्षाधान’ भी शामिल है। इसकी पैदावार क्षमता करीब 4.0 टन प्रति हेक्टेयर है और यह किसानों के बीच लोकप्रिय किस्मों में गिनी जाती है। संस्थान ने देश के अलग-अलग हिस्सों में मध्यम और कम गहरे पानी वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त धान की किस्मों की पहचान भी की है। इसका उद्देश्य स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किसानों को बेहतर किस्मों का विकल्प उपलब्ध कराना है।
जलजमाव से धान की फसल को कई नुकसान
फसल की शुरुआती अवस्था में लंबे समय तक पानी जमा रहने से धान के पौधों में कल्ले निकलने की संख्या कम हो सकती है। इससे पौधों की वृद्धि प्रभावित होने के साथ उनके मरने का खतरा भी बढ़ जाता है। जल निकासी की व्यवस्था खराब होने पर मिट्टी में कुछ जहरीले तत्व जमा हो सकते हैं। लौह विषाक्तता और सल्फाइड से होने वाली क्षति जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। इसके अलावा जलजमाव वाली परिस्थितियों में कीट और रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है। केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. टी.के. आध्या के अनुसार जलजमाव वाली परिस्थितियों में फसल प्रबंधन बड़ी चुनौती है। ऐसे क्षेत्रों में धान का उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए किस्मों में सुधार महत्वपूर्ण विकल्प है।
नई किस्मों में होने चाहिए विशेष गुण
जलजमाव वाले क्षेत्रों के लिए विकसित धान की किस्मों में कुछ विशेष गुण होना जरूरी माना जाता है। इनमें 115 से 130 सेंटीमीटर की उचित ऊंचाई, मजबूत तना और सीधी पत्तियां प्रमुख हैं। इसके अलावा पौधे की शुरुआती अवस्था में सूखे को सहन करने की क्षमता, बिना तने की लंबाई बढ़ाए कुछ समय तक पानी में डूबे रहने को सहन करने की क्षमता और मजबूत बीज सुप्तावस्था जैसे गुण भी जरूरी हैं।
पूर्वी भारत के लिए बढ़ेगी उपयोगिता
कम उर्वरक वाले लेकिन उत्पादन की अधिक क्षमता रखने वाले जलजमाव प्रभावित क्षेत्रों से अधिक पैदावार हासिल करना विशेष रूप से पूर्वी भारत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नई किस्मों के विकास से ऐसे क्षेत्रों में किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बेहतर विकल्प मिल सकते हैं।
धान में बौना वायरस को लेकर भी चिंता
पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड में वैज्ञानिक अध्ययनों के दौरान जांचे गए नमूनों में दक्षिणी चावल काली-धारी बौना विषाणु की पहचान हुई है। शुरुआती जांच में धान की रुकी हुई वृद्धि और इस विषाणु के बीच संबंध के संकेत मिले हैं। हालांकि खेतों में इसके प्रसार की पूरी पुष्टि के लिए नियंत्रित परिस्थितियों में सफेद पीठ वाले फुदके की भूमिका की जांच की जा रही है। यह कीट इस विषाणु के संभावित वाहक के रूप में देखा जा रहा है।
किसानों को निगरानी और बचाव की सलाह
किसानों को धान के खेतों की मेड़ों को साफ रखने और आसपास के खरपतवार हटाने की सलाह दी गई है। शुरुआती अवस्था में संक्रमित पौधों की पहचान करके उन्हें खेत से अलग करना भी जरूरी है। यदि संक्रमण की दर 5 से 20 प्रतिशत के बीच हो तो प्रभावित कल्लों को हटाकर उनकी जगह स्वस्थ कल्ले लगाए जा सकते हैं। किसानों को सफेद पीठ वाले फुदके की मौजूदगी पर भी नियमित निगरानी रखने की सलाह दी गई है। इसके लिए कुछ पौधों को हल्का झुकाकर उनके निचले हिस्से पर सप्ताह में दो से तीन बार थपथपाकर देखा जा सकता है। यदि कीट के शिशु या वयस्क मौजूद होंगे तो वे पानी की सतह पर तैरते हुए दिखाई दे सकते हैं।
कीट दिखाई देने पर विशेषज्ञों की सलाह से करें छिड़काव
सफेद पीठ वाले फुदके की मौजूदगी मिलने पर कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार अनुशंसित कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए ट्राइफ्लुमेजोपाइरिम, डिनोटेफुरन या पाइमेट्रोजिन आधारित अनुशंसित दवाओं का प्रयोग बताया गया है। छिड़काव करते समय पौधों के निचले हिस्से तक दवा पहुंचाना जरूरी माना जाता है, क्योंकि कीट मुख्य रूप से पौधे के निचले हिस्से में पाए जा सकते हैं। किसानों को किसी भी दवा का प्रयोग स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह और निर्धारित मात्रा के अनुसार ही करना चाहिए।
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