अगर आप गन्ने की खेती करने जा रहे हैं, तो यह जानना जरूरी है कि लाल सड़न रोग (Red Rot) से बचाव के उपाय पहले से किए बिना फसल लगाना घातक साबित हो सकता है। यह रोग गन्ने की फसल को पूरी तरह से नष्ट कर सकता है, और देश भर में गन्ने की कई ऐसी किस्में जो अब तक अधिक उत्पादन देती रही हैं, इस घातक रोग की चपेट में आ चुकी हैं। उत्तर प्रदेश में सीओ-0238, जो दशकों से सबसे अधिक उत्पादन और उच्च चीनी प्रतिशत देने वाली गन्ने की किस्म रही है, अब लाल सड़न रोग से बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
गन्ना विकास विभाग और कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि वे सीओ-0238 किस्म की खेती से बचें क्योंकि उत्तर प्रदेश में लाल सड़न रोग का प्रमुख स्ट्रेन सी.एफ. 13 पाया गया है, जो इस किस्म को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। ऐसे में गन्ना किसानों को इस रोग से बचाव के लिए पर्याप्त उपाय पहले से करने की आवश्यकता है।
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यह रोग अक्सर तब फैलता है जब एक ही खेत में लगातार एक ही किस्म की गन्ने की खेती की जाती है। यदि खेत की मिट्टी का pH 5-6 हो तो यह रोग तेजी से फैल सकता है। इसके अलावा, जल-जमाव होने पर कवक का विकास भी तेजी से होता है। लंबी अवधि तक सूखा पड़ने से इस रोग का संक्रमण और बढ़ सकता है। यदि गन्ने के बीजों को प्रभावित खेतों से लिया जाए, तो यह रोग अन्य खेतों में भी फैल सकता है।
अगर किसान जागरूक होकर जैविक और वैज्ञानिक उपाय अपनाते हैं तो वे गन्ने की फसल को नुकसान से बचा सकते हैं और अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं। गन्ना विकास विभाग द्वारा सुझाए गए नए और रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। विभाग और गन्ना शोध संस्थान, लखनऊ के अनुसार, CO-0238 की जगह नई रोग-प्रतिरोधी किस्में अपनाने से किसान इस रोग से बच सकते हैं।
गन्ने की बुवाई से पहले बीजों की जांच करना बेहद महत्वपूर्ण है। यदि बीजों के दोनों ओर लाल रंग की लाली (Red Rot) दिखाई दे, तो उन्हें बिल्कुल न बोएं। गन्ने के बीजों को 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम या मैंकोजेब प्रति लीटर पानी में घोलकर उपचारित किया जा सकता है। इसके अलावा, यदि संभव हो तो 54°C तापमान पर 1 घंटे तक गर्म आर्द्रीकरण मशीन में बीजों का उपचार करना भी प्रभावी है।
लाल सड़न रोग के नियंत्रण के लिए गन्ना शोध संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने ट्राइकोडर्मा हार्जियानम (Trichoderma Harzianum) नामक जैविक कवकनाशी (Biopesticide) का सुझाव दिया है, जो मिट्टी और पौधों की सतह पर काम करके गन्ने के लाल सड़न रोग के हानिकारक फंगस के विकास को रोकता है।
ट्राइकोडर्मा से नियंत्रण करने के लिए, गन्ने की बुवाई से पहले खेत की तैयारी के समय 2 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा हार्जियानम को गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट में मिलाकर खेत में डालें। इसे आखिरी जुताई से 7 दिन पहले अच्छे से मिला दें। इससे खेत की मिट्टी में लाभकारी जैविक कारक सक्रिय रहेंगे और हानिकारक कवकों के प्रसार को रोका जा सकेगा।
इसके अलावा, कात्यायनी टायसन फंगीसाइड का उपयोग भी लाभकारी साबित हो सकता है। यह जैविक दवा ट्राइकोडर्मा विरिडी से निर्मित होती है और गन्ने को लाल सड़न रोग और अन्य फंगल संक्रमणों से बचाने में मदद करती है। यह दवा लाल सड़न रोग के संक्रमण को 50% तक कम करती है और मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों को बढ़ावा देती है, जिससे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम होती है।
गन्ने की खेती में लाल सड़न रोग से बचाव के लिए किसानों को जागरूक रहकर उचित उपायों का पालन करना आवश्यक है। सही किस्म का चयन, स्वस्थ बीज का उपयोग, और जैविक दवाओं का प्रयोग इस रोग से बचाव में मददगार साबित हो सकता है। इसके साथ ही, गन्ना विकास विभाग और कृषि वैज्ञानिकों की सलाहों का पालन करके किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं और अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
