नई दिल्ली: जैसा की हम सब लोग जानते है भारत एक कृषि प्रधान देश है। भारत की भौगोलिक स्थिति को हम देखें तो भारत में विभिन्न प्रकार के एग्रो क्लाईमेटिक जोन्स पाए जाते है जो कि विभिन्न प्रकार के फूलों का उत्पादन लेने के लिए उपयुक्त है।
भारत में फूलों की खेती महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रदेश, हरियाणा, तमिलनाडू, राजस्थान, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में की जाती है। फूलों की खेती पूर्व में खुले खेत में की जाती थी परन्तु कृषि में आई नई तकनीकी की वजह से अब फूलों की खेती कट फ्लावर (जरबेरा, डच गुलाब, गुलदाउदी, एन्थुरीयम, ओरचिडस, कार्नेशन इत्यादि) के रूप में ग्रीन हाउस में की जा रही है। डच गुलाब की खेती इन सबसे अग्रणीय है। उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र के तलेगांव दाभाडे (मावल) जिला पुणे में फ्लोरीकल्चर पार्क की स्थापना की गई है जिससे कई कृषकों ने प्रेरित होकर फ्लोरीक्लचर के व्यवसाय को अपनाया है। नेशनल होर्टिकल्चर बोर्ड (छभ्ठ) एवं नेशनल होर्टिकल्चर मिशन (छभ्ड) ने कृषकों को फूलों की खेती एवं ग्रीन हाउस बनाकर कट फ्लावर की खेती को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है और साथ ही इसके लिए सब्सिडी का प्रावधान भी किया है। छोटे कृषकों ने भी कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग अपनाकर फूलों के निर्यात में अहम भूमिका निभाई है।
भारतीय कृषि में फूलों के उत्पादन को हम अगर उगते हुए सूर्य का दर्जा दे तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। भारत एवं विश्व में फूलों की बढ़ती हुई मांग की वजह से पुष्प कृषि वाणिज्यिक व्यापार की श्रेणी में आ गई है। औद्योगिक एवं व्यापार नीतियां के उद्धारीकरण की वजह से फूलां के निर्यात को प्रोत्साहन मिला है। वही निर्यातकों एवं कृषकों द्धारा ग्रीन हाउस में नियंत्रित जलवायु परिस्थितियां के तहत डच गुलाब एवं अन्य कटफ्लावर के उत्पादन की तरफ उनका रूझान बढ़ा है।
अगर हम तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तो यह पाया गया है कि व्यापारिक फूलां की खेती में अन्य फसलां की अपेक्षा प्रति इकाई क्षेत्र में ज्यादा पैदावार एवं ज्यादा मुनाफा देने की क्षमता होती है इसलिए निर्यातकों एवं कृषकों का रूझान इस तरफ बढ़ी तेजी से बढ़ रहा है।

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (।च्म्क्।) भारत की राष्ट्रीय स्तर की संस्था है जो कि हमारे देश में फूलों की खेती के विकास एवं निर्यात बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
भारत में वर्ष 2014-2015 के दौरान पुष्प कृषि के तहत 248.51 हजार हैक्टयेर क्षेत्र था और इस वर्ष 1,685 हजार टन खुले फूल और 472 हजार टन कट फ्लावर का उत्पादन प्राप्त हुआ। वहीं अगर निर्यात की बात करें तो वर्ष 2015-2016 में संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाईटेड किंगडम, जर्मनी, हॉलेन्ड और संयुक्त राज्य अमीरात इत्यादि देशों को फूलों का निर्यात किया गया।
भारत में वर्ष 2015-2016 के दौरान लगभग 22,518.58 मीट्रिक टन पुष्प कृषि उत्पाद का निर्यात किया जिससे 479.42 करोड़ रूपये की विदेशी मुद्रा देश में आई।
डच गुलाब एवं फूलां की मांग क्रिसमस, वेलेनटाइन डे, फादर्स डे, मदर्स डे, शादी ब्याह एवं त्यौहारों पर ज्यादा रहती है। विशेषतौर से युरोपीय देशां में सबसे ज्यादा भारतीय फूलों की मांग रहती है। ऐसे में युरोपीय संघ की मुद्रा युरो की कीमत भारतीय रूपये के सामने कमजोर पड़ना भारतीय फूल निर्यातकों के लाभ को काफी हद तक कम कर देता है। जैसा की पूर्व में कई बार हो चुका है। युरो की कीमत 75 रूपये वर्तमान में होती है और वहीं निर्यात के समय आकस्मिक 71.91 रूपये मात्र।
गत वर्ष भारतीय बाजार में भी शादियां के अवसर पर नोट बन्दी होने से फूलां के बाजार में नरमी देखी गई। आमतौर पर बैंगलोर से 4-5 मिलीयन डच गुलाब की देश के विभिन्न राज्यां में वेलेनटाइन डे के दौरान शिपमेन्ट किया जाता है। परन्तु इस बार नोट बन्दी का असर यहाँ भी देखने को मिला।
आमतौर पर वेलेंटाइन डे ऑफिसों में, स्कूलों में, कॉलेजां में मनाया जाता है। इस दिन रविवार हो तो डच गुलाब की मांग इस अवसर पर काफी हद तक कम हो जाती है। इस कारण भारतीय निर्यातकों को अपेक्षा से कम मुनाफा होता है।
अधिकतर समय वेलेनटाइन डे एवं चीन का नववर्ष महोत्सव लगभग एक ही समय आता है जिससे फूलां की मांग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ जाती है। परन्तु कभी कभी ऐसा न होने पर फूलां की मांग भारतीय निर्यातकों की अपेक्षा से कम रह जाती है। और उन्हें विदेशी मुद्रा भी कम प्राप्त होती है।
डच गुलाब का वेलेनटाइन डे के दौरान सबसे ज्यादा निर्यात 4 फरवरी से 14 फरवरी के बीच होता है।
फूल बडे़ नाजुक होते है इसलिए विशेषतौर पर कोल्ड चेन मेनेजमेन्ट का ध्यान निर्यात के दौरान रखा जाता है। इसके लिए कोल्डस्टोरेज, वातानुकूलित वाहन एवं हवाई जहाज के द्धारा विदेशों में भेजा जाता है। थोड़ी सी भी लापरवाही कोल्ड चेन मेनेजमेन्ट बोटराईटिस नामक फफुंद जनित रोग को आमनि़्त्रत कर सकती है और अच्छी गुणवŸा के फूलों की कीमत शून्य हो जाती है।
गुलाब का निर्यात करते समय आयात करने वाली कंपनियों या व्यक्ति विशेष की डिमान्ड के मुताबिक शिपमेन्ट भेजा जाता है। जैसे फूलों की किस्म, कट स्टेज, डन्डी की लम्बाई, कली की लम्बाई एवं मोटाई, एक गुच्छे में, पैकिंग के डिब्बों का रंग, गुणवŸा एवं आकार, एक डिब्बे में कट फ्लावर के गुच्छों की संख्या इत्यादि।
दक्षिण भारत से ज्यादा डच गुलाब का निर्यात किया जाता है। गत वर्ष ताजमहल (लाल रंग वाली) किस्म का दक्षिण भारत से ज्यादा निर्यात हुआ। उल्लेखनीय है कि यह किस्म बैंगलोर एवं कृष्णागीरी के आसपास के क्षेत्र एवं तमिलनाडू राज्य के कुछ जिलां में इसकी व्यवसायिक खेती की जाती है।
आमतौर पर निर्यात करने के लिए दो महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ध्यान रखना आवश्यक होता है पहली फूलों की गुणवŸा ओर दुसरी फूलों की मात्रा।
विश्व की सबसे बड़ी फूलों की मण्डी नीदरलेण्ड में अल्समीर में है वहीं हमारे देश की सबसे बड़ी फूलों की मण्डी नई दिल्ली के पास गाजीपुर मण्डी है। जो कि पूर्व में कनाट पैलेस थी।
साउथ इन्डिया फ्लोरिकल्चर एसोसियेशन एवं वेर्स्टन इन्डिया फ्लोरिकल्चर एसोसियेशन दक्षिणी एवं पश्चिमी भारत में फूलों की खेती करने वाले कृषकों एवं कंपनियों के हितों की रक्षा करती हैं एवं निर्यात बढ़ाने एवं फूलों की खेती को बढ़ाने में प्रोत्साहन देती है।
– डॉ. राजेश कुमार सैनी (पर्यावरणविद् एवं इंटरनेशनल ट्रेनर)
