खेती-किसानी

मछली पालन से मुनाफा कमाना है तो जानिए ‘बीज से मछली’ तक का पूरा सफर

नई दिल्ली: मछली पालन आज ग्रामीण भारत में आमदनी का एक बड़ा जरिया बन चुका है। सरकार से लेकर निजी क्षेत्र तक सभी इसे बढ़ावा देने में जुटे हैं। लेकिन इस क्षेत्र में मुनाफा तभी संभव है जब शुरुआत सही हो। मछली पालन की शुरुआत होती है बीज (Fish Seed) से, जिसे बाजार से लाकर तालाब में डाला जाता है। लेकिन हर बीज से मछली तैयार हो, यह जरूरी नहीं है। हैचरी एसोसिएशन के अध्यक्ष रवि कुमार येलंका के मुताबिक, अगर एक तालाब में 1000 मछली बीज डाले जाते हैं, तो औसतन 250 से 300 बीज ही पूरी तरह विकसित मछली बन पाते हैं।

मछली पालन का यह सफर जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं। बाजार में मिलने वाले मछली बीज की क्वालिटी, साइज, ट्रांसपोर्टेशन और तालाब की तैयारी – इन सभी कारकों का बड़ा असर होता है। देश में मछली बीज यानी हैचरी का सबसे बड़ा उत्पादन पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश में होता है। यहां से बीज देश के अलग-अलग हिस्सों में सप्लाई किए जाते हैं। मछली का बीज आम तौर पर तीन आकारों में तैयार किया जाता है – जीरा साइज, स्पान साइज और फिंगर साइज। इनमें से सबसे अधिक डिमांड जीरा साइज बीज की होती है। यह बीज आमतौर पर एक हजार की संख्या में पैक कर बाजार में बेचे जाते हैं। लेकिन यहीं से शुरू होती है सबसे बड़ी चुनौती। जीरा साइज बीज को अगर सीधे तालाब में डाल दिया जाए, तो इनकी सफलता दर महज 25 प्रतिशत के करीब रह जाती है। यानी 1000 बीजों में से सिर्फ 250 के आसपास ही आगे चलकर मछली बन पाते हैं।

बीज की इस कम सफलता दर के पीछे एक कारण है ट्रांसपोर्ट के दौरान होने वाला नुकसान। जीरा साइज के बीज छोटे और नाजुक होते हैं, जिनकी ट्रांसपोर्टिंग के दौरान मृत्यु दर काफी ज्यादा होती है। इससे बचने का उपाय है – इन्हें सीधे तालाब में न डालकर पहले नर्सरी तालाब में स्थानांतरित करना। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर जीरा साइज बीज को नर्सरी में 15-30 दिन रखा जाए तो उनकी ग्रोथ बेहतर होती है और वे धीरे-धीरे फिंगर साइज या 100 ग्राम तक के हो जाते हैं। नर्सरी में इन बीजों को सरसों की खल और चावल के छिलके के चूरे से तैयार चारा खिलाया जाता है, जिससे उनकी प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है और बीमारी का खतरा कम होता है।

नर्सरी में बीज रखने से उनकी सफलता दर 35 से 40 प्रतिशत तक पहुंच जाती है, जो सीधे तालाब में डालने की तुलना में कहीं अधिक है। इसके अलावा, नर्सरी में मछलियों का स्वास्थ्य बेहतर रहता है और वे तालाब में डालने के बाद तेजी से विकसित होती हैं। बात करें प्रमुख मछली प्रजातियों की तो रोहू, कतला और मृगाल जैसी मछलियां 18 महीने में 1.5 से 2 किलो तक वजन प्राप्त कर लेती हैं। बाजार में मछली की कीमत उसी के वजन के हिसाब से तय होती है। यानी जितनी वजनी मछली, उतनी अधिक कीमत। इसलिए मछली पालन से मुनाफा तभी संभव है जब बीज से लेकर पालन तक की प्रक्रिया सही वैज्ञानिक विधि से अपनाई जाए।

ऐसे में, कहा जा सकता है कि मछली पालन में असली मुनाफा मछली के वजन पर निर्भर करता है। और वजन तभी बढ़ेगा, जब बीज से लेकर पालन तक हर चरण पर सावधानी बरती जाए। तालाब का वातावरण, शुरुआती नर्सरी का रखरखाव और मछलियों के लिए सही आहार – ये सभी तत्व मिलकर ही सफल मछली पालन की गारंटी बनते हैं। जो किसान इसे वैज्ञानिक पद्धति से करते हैं, वे बेहतर उत्पादन के साथ बेहतर मुनाफा भी कमा रहे हैं।

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