नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने गैर-बासमती चावल के निर्यात को पारदर्शी और संगठित बनाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। अब गैर-बासमती चावल के निर्यात के लिए कॉन्ट्रैक्ट्स का अनिवार्य पंजीकरण (Mandatory Registration) किया जाएगा और निर्यातकों से प्रति टन 8 रुपये शुल्क वसूला जाएगा। सरकार का कहना है कि इस शुल्क का उपयोग गैर-बासमती चावल को वैश्विक बाजार में ‘इंडिया ब्रांड’ के रूप में स्थापित करने और उसके प्रचार-प्रसार में किया जाएगा।
क्यों उठाया गया यह कदम?
वर्तमान में गैर-बासमती चावल की कई किस्में बड़े पैमाने पर निर्यात होती हैं। लेकिन विदेशी बाजार में स्थानीय आयातक इन्हें अपनी पैकिंग में बेचते हैं, जिससे भारतीय पहचान खो जाती है। सरकार चाहती है कि भारतीय गैर-बासमती चावल की पहचान और ब्रांड वैल्यू विश्व स्तर पर मजबूत हो।
बासमती विवाद के बाद सर्वसम्मति से हुआ फैसला
हाल ही में बासमती चावल पर शुल्क वृद्धि के बाद उद्योग में मतभेद सामने आए थे। इसके विपरीत, गैर-बासमती चावल निर्यातकों की तीनों प्रमुख संघों ने सरकार के इस निर्णय का समर्थन किया है। ‘दि राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन सीजी’ (TREA-CG) के अध्यक्ष मुकेश जैन ने कहा कि यह फैसला हितधारकों की बैठक में सर्वसम्मति से लिया गया और 24 सितंबर को अधिसूचित किया गया है।
डेटा से होगा निर्यात को फायदा
TREA अध्यक्ष बीवी कृष्णा राव ने बताया कि बासमती उद्योग में लंबे समय से कॉन्ट्रैक्ट पंजीकरण होता आया है। अब गैर-बासमती के लिए भी यह कदम जरूरी है। उन्होंने कहा कि एपीडा (APEDA) के पास अनुबंध डेटा होने से यह ट्रैक करना आसान होगा कि कौन-सा देश कितना माल खरीद रहा है और निर्यात का प्रवाह किस दिशा में है। राव ने स्पष्ट किया कि यह प्रणाली तभी सफल होगी जब अनुबंधों की पुष्टि तेजी से की जाएगी।
भारतीय चावल को मिलेगा वैश्विक प्रमोशन
इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) और श्री लाल महल ग्रुप के चेयरमैन प्रेम गर्ग ने इस कदम को “प्रगतिशील और स्वागत योग्य” बताया। उन्होंने कहा कि अब निर्यातक ऑनलाइन पंजीकरण प्रमाणपत्र आसानी से प्राप्त कर सकेंगे और 8 रुपये प्रति टन शुल्क कोई बोझ नहीं है, बल्कि यह एक राइस ट्रेड डेवलपमेंट फंड में योगदान होगा, जिसका इस्तेमाल भारतीय चावल के वैश्विक प्रमोशन में किया जाएगा।
दस्तावेजीकरण से दूर होंगी दिक्कतें
मुकेश जैन ने बताया कि हाल ही में कुछ देशों में 2,000 कंटेनरों का डेटा असंगत पाया गया था। एपीडा के हस्तक्षेप से यह समस्या हल हुई। नई प्रणाली से उचित दस्तावेजीकरण और अनुबंध पंजीकरण के जरिए निर्यातकों की चिंताओं का समाधान हो सकेगा। रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया और प्रति टन 8 रुपये शुल्क तय किया। यह कदम भारतीय चावल को ‘इंडिया ब्रांड’ के रूप में वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देगा।
ये भी पढ़ें: MP में सोयाबीन पर भावांतर योजना लागू, MSP 5328 रुपए तय
