भारत में दालों को लेकर आत्मनिर्भरता का सपना अब हकीकत से दूर होता जा रहा है। चना, मसूर, मूंग, अरहर और उड़द जैसी प्रमुख दालों की मंडियों में जो भाव देखने को मिल रहे हैं, वे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से भी नीचे हैं। यह स्थिति तब है जब देश में इन दालों की मांग आपूर्ति से अधिक है। जाहिर है कि बाजार के स्वाभाविक नियमों के अनुसार कीमतें बढ़नी चाहिए थीं, लेकिन सच्चाई इसके उलट है। इसका बड़ा कारण विदेशों से सस्ती दालों का आयात है, जिसने घरेलू बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है।
इस समय देश के बाजार सस्ते आयात से भरे पड़े हैं और इसका असर यह हो रहा है कि किसान दलहन की खेती छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं। उन्हें उनके उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। द ग्रेन, राइस एंड ऑयलसीड्स मर्चेंट्स एसोसिएशन (GROMA) के अध्यक्ष भीमजी एस. भानुशाली ने चेतावनी दी है कि यदि यह सिलसिला जारी रहा, तो देश का घरेलू दाल व्यापार पूरी तरह समाप्त हो जाएगा और भारत आत्मनिर्भर होने के बजाय पूरी तरह आयात पर निर्भर बन जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी कंपनियों की नीति भारत में शुल्कमुक्त दालें भेजकर भारतीय कृषि को खत्म करने की है।
नीति आयोग के अनुसार वर्ष 2025 में देश में दालों की मांग लगभग 290 लाख टन है जबकि उत्पादन 252 लाख टन ही हो पा रहा है। इसके बावजूद देश में 72 लाख टन से अधिक दालों का आयात किया गया है, जो मांग और उत्पादन के अंतर से कहीं ज्यादा है। इससे स्पष्ट है कि बाजार में दालों की आपूर्ति आवश्यकता से अधिक है, जो मूल्य गिरने का प्रमुख कारण है।
खेती के आंकड़े भी इस संकट की पुष्टि करते हैं। 2021-22 में दलहन की खेती का क्षेत्रफल 307 लाख हेक्टेयर था, जो अब घटकर 276 लाख हेक्टेयर रह गया है। इसी अवधि में दालों का उत्पादन भी घटा है। किसान दूसरी फसलों की ओर शिफ्ट हो रहे हैं क्योंकि वहां उन्हें बेहतर कीमत मिल रही है। मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में चने की खेती का क्षेत्रफल तेजी से घटा है और किसान गेहूं जैसी अधिक लाभकारी फसलें उगा रहे हैं।
भारत की प्रति हेक्टेयर दाल उत्पादन क्षमता भी वैश्विक औसत से काफी पीछे है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रति हेक्टेयर औसतन 766 किलो दाल का उत्पादन होता है, जबकि वैश्विक औसत 1015 किलो है। रूस, इथोपिया, कनाडा और चीन जैसे देशों में यह आंकड़ा भारत से कहीं अधिक है। वैज्ञानिक समुदाय से भी यह अपेक्षा की जा रही है कि वह ऐसी वैरायटी और तकनीकें विकसित करे जो उत्पादन को बढ़ा सकें और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से लड़ सकें।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार दालों की खेती मौसम के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती है। कर्नाटक में सूखा, फंगल बीमारियां और जलवायु परिवर्तन के असर से किसान परेशान हैं। वैज्ञानिक नई जलवायु-अनुकूल किस्मों पर काम कर रहे हैं लेकिन परिणाम अभी व्यापक स्तर पर सामने नहीं आए हैं।
सरकार ने दावा किया है कि 2027 तक देश को दालों के मामले में आत्मनिर्भर बना दिया जाएगा और एक भी दाना दाल आयात नहीं करना पड़ेगा। मगर किसानों को अगर MSP से भी कम मूल्य मिलेगा, तो यह दावा कैसे साकार होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक किसानों को उनके उत्पाद का लाभकारी मूल्य नहीं मिलेगा, तब तक न क्षेत्रफल बढ़ेगा, न उत्पादन, और आत्मनिर्भरता एक दूर का सपना ही बनी रहेगी।
दालों में आत्मनिर्भरता के लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर दाल बेचने की मजबूरी से मुक्त किया जाए। इसके साथ ही अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए और दलहन की खेती को गेहूं-धान जैसी फसलों की तरह मशीन आधारित बनाया जाए। जब तक दालों की खेती किसानों के लिए लाभकारी नहीं होगी, तब तक देश आत्मनिर्भर नहीं बन सकेगा और हर साल दाल के संकट का यह चक्र चलता रहेगा।

