खेती-किसानी

धान की सीधी बुवाई से होगी पानी और लागत की बचत

Direct Seeded Rice dsr

पटना: जलवायु परिवर्तन और अल नीनो के बढ़ते प्रभाव के बीच खरीफ मौसम की खेती नई चुनौतियों का सामना कर रही है। कहीं अत्यधिक वर्षा तो कहीं सूखे जैसी स्थिति के कारण धान की खेती प्रभावित हो रही है। ऐसे समय में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के वैज्ञानिक किसानों को पारंपरिक रोपाई के बजाय धान की सीधी बुवाई तकनीक अपनाने की सलाह दे रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक कम पानी, कम लागत और कम श्रम में बेहतर उत्पादन देने के साथ बदलते मौसम की चुनौतियों का सामना करने में भी मददगार साबित हो सकती है।

इन मशीनों की मदद से करें धान की सीधी बुवाई

वैज्ञानिकों के अनुसार धान की सीधी बुवाई का सबसे उपयुक्त समय 15 से 30 जून तक माना जाता है। हालांकि यदि मानसून में देरी हो जाए तो किसान 15 जुलाई तक भी इस तकनीक से बुवाई कर सकते हैं। इस विधि में नर्सरी तैयार करने और रोपाई की आवश्यकता नहीं होती। किसान सीधे खेत में मशीनों की सहायता से बीजों की बुवाई कर सकते हैं। जिन खेतों में फसल अवशेष मौजूद हों वहां हैप्पी सीडर, रोटरी डिस्क ड्रिल, डबल डिस्क कोल्टार और स्टार व्हील जैसी मशीनों का उपयोग किया जा सकता है। वहीं साफ खेतों में जीरो टिल ड्रिल या बहुफसली जीरो टिल ड्रिल से बुवाई करना उपयुक्त माना गया है। पर्याप्त नमी होने पर बीजों को दो से तीन सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए।

सही मिट्टी और संतुलित पोषण से मिलेगा बेहतर उत्पादन

सीधी बुवाई तकनीक बलुई दोमट से लेकर भारी चिकनी मिट्टी तक सभी प्रकार की भूमि में अपनाई जा सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस विधि में प्रति हेक्टेयर 80 से 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 से 60 किलोग्राम फॉस्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। बुवाई के समय नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा तथा फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत में देनी चाहिए। पोटाश मशीन के पाइप में चिपक सकता है, इसलिए इसे पहले ही खेत में छिड़क देना बेहतर माना जाता है। शेष नाइट्रोजन दो बराबर हिस्सों में कल्ले निकलने और बालियां आने के समय देनी चाहिए। इस तकनीक से अच्छी किस्मों में 40 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

अल नीनो के प्रभाव को कम करने में मददगार तकनीक

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि सीधी बुवाई तकनीक अपनाने से पानी की 30 से 40 प्रतिशत तक बचत होती है। इसके अलावा फसल चक्र 7 से 12 दिन पहले पूरा हो जाता है, खेती की लागत घटती है, श्रमिकों पर निर्भरता कम होती है और पौधों की जड़ें अधिक गहरी विकसित होती हैं, जिससे फसल की सूखा सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है।

इन धान किस्मों का करें चयन

वैज्ञानिकों ने किसानों को कम अवधि में तैयार होने वाली और सूखा सहन करने वाली धान की किस्मों का चयन करने की सलाह दी है। इनमें सहभागी धान, स्वर्ण श्रेया, स्वर्ण शक्ति, डीआरआर-42, सरयू-52, राजेंद्र भगवती, पीआरएस-10, एराइज-6129, एराइज तेज, आरएच-257, डीआरएच-2366, डीआरएच-834, पीएसी-807 सहित अन्य उपयुक्त किस्में शामिल हैं। बुवाई से पहले बीजों को 8 से 10 घंटे तक पानी में भिगोकर रखना और उनका उपचार करना आवश्यक है। मोटे दाने वाली किस्मों के लिए 20 से 25 किलोग्राम तथा मध्यम दाने वाली किस्मों के लिए 25 से 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त माना गया है।

खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान दें

सीधी बुवाई तकनीक में खेत में लगातार पानी नहीं रहने के कारण खरपतवार तेजी से बढ़ते हैं। इसलिए वैज्ञानिकों ने समय पर खरपतवार नियंत्रण की सलाह दी है। बुवाई के 24 से 48 घंटे के भीतर अंकुरण से पहले उपयुक्त खरपतवारनाशी का निर्धारित मात्रा में पानी के साथ छिड़काव करना चाहिए। इसके बाद बुवाई के 25 से 30 दिन बाद दूसरी बार खरपतवार नियंत्रण करना जरूरी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि समय पर खरपतवार प्रबंधन करने से सीधी बुवाई तकनीक से बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

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