नई दिल्ली: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच भारत सहित एशिया के कई देशों पर अल नीनो का खतरा मंडरा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार मई से जुलाई के बीच इसकी स्थिति बनने की संभावना है, जिससे मौसम के पैटर्न में बड़ा बदलाव आ सकता है। अल नीनो सक्रिय होने का सीधा असर तापमान, वर्षा और हवा के दबाव पर पड़ता है, जिससे खेती और ऊर्जा क्षेत्र दोनों प्रभावित होते हैं।
हीटवेव और सूखे की आशंका
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो के दौरान सामान्य मौसम चक्र बिगड़ जाता है। इससे कहीं अत्यधिक गर्मी और सूखे की स्थिति बनती है, तो कहीं अनियमित और भारी वर्षा देखने को मिलती है। भारत और एशिया के कई देशों में इससे हीटवेव का खतरा बढ़ सकता है, जिससे फसलों पर सीधा असर पड़ेगा।
खेती पर बढ़ेगा संकट
बढ़ते तापमान और कम वर्षा के कारण खेती-बाड़ी पर दबाव बढ़ सकता है। सूखे की स्थिति में फसलों की पैदावार घटने की आशंका रहती है। साथ ही अनियमित बारिश से बुवाई और फसल की वृद्धि प्रभावित होती है। इससे किसानों की आय पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
ऊर्जा और संसाधनों पर असर
अल नीनो के कारण गर्मी बढ़ने से ऊर्जा की मांग में तेजी आ सकती है। वहीं पनबिजली उत्पादन पर दबाव बढ़ेगा, क्योंकि जल स्तर प्रभावित हो सकता है। ऐसे समय में यदि ईंधन की आपूर्ति बाधित होती है, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।
वैश्विक हालात से बढ़ी चिंता
पश्चिम एशिया में तनाव के चलते ऊर्जा संसाधनों और जरूरी आपूर्ति पर पहले से ही दबाव बना हुआ है। ऐसे में अल नीनो की स्थिति बनने पर तेल और गैस की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जिससे लागत बढ़ेगी और इसका असर खेती पर भी पड़ेगा।
खाद और लागत का बढ़ता दबाव
विशेषज्ञों के अनुसार यदि खेती में इस्तेमाल होने वाली खाद और अन्य संसाधनों की कीमतें बढ़ती हैं, तो किसानों की लागत बढ़ेगी। यदि फसलों के दाम इस लागत के अनुसार नहीं बढ़े, तो किसानों का मुनाफा घट सकता है। इससे खाद का उपयोग कम हो सकता है और उत्पादन में गिरावट आ सकती है।
खाद्य सुरक्षा पर असर
इन सभी परिस्थितियों का सीधा असर खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है। उत्पादन घटने और लागत बढ़ने से खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे आम लोगों पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संभावित संकट से निपटने के लिए समय रहते ठोस कदम उठाना जरूरी है, ताकि खेती और अर्थव्यवस्था दोनों को सुरक्षित रखा जा सके।
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