नई दिल्ली: देश में कपास की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी अब वस्त्र उद्योग के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार के प्रभाव से घरेलू स्तर पर भी कपास महंगा हो रहा है, जिससे सूत उत्पादन से लेकर परिधान निर्यात तक पूरी श्रृंखला पर दबाव बढ़ गया है। उद्योग जगत ने सरकार से निर्यात प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए कपास के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति देने की मांग की है।
पूरी श्रृंखला पर बढ़ा दबाव
दक्षिण भारत मिल्स एसोसिएशन के अनुसार कपास की कीमतों में तेजी का असर पूरे वस्त्र क्षेत्र पर पड़ रहा है। विशेष रूप से परिधान क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित है, क्योंकि यहां लागत बढ़ने के बावजूद कीमतों में वृद्धि की गुंजाइश सीमित होती है। लगातार बढ़ती कीमतों से निर्यातकों के मुनाफे पर सीधा असर पड़ रहा है।
लागत बढ़ने से बढ़ी चिंता
उद्योग के अनुसार यह स्थिति ऐसे समय में बनी है, जब वस्त्र निर्यात पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और मांग में उतार-चढ़ाव के कारण बाजार पर दबाव बना हुआ है। सूत उत्पादन इकाइयां अभी संचालन बनाए हुए हैं, लेकिन कीमतों में और वृद्धि होने पर यह क्षेत्र भी प्रभावित हो सकता है।
उत्पादन और मांग में अंतर
जानकारों के अनुसार देश में कपास का उत्पादन लगभग 290 लाख गांठ है, जबकि घरेलू मांग करीब 330 लाख गांठ की है। इस अंतर को देखते हुए उद्योग ने मई से अक्टूबर के बीच आयात शुल्क हटाने की मांग की है, ताकि आपूर्ति संतुलित रखी जा सके और कीमतों को नियंत्रित किया जा सके।
गुणवत्ता की भी बनी चुनौती
पिछले वर्ष असमय बारिश के कारण कपास की गुणवत्ता पर असर पड़ा है, जिससे बेहतर गुणवत्ता वाले कपास की कमी महसूस की जा रही है। इसका प्रभाव उत्पादन और निर्यात दोनों पर पड़ रहा है।
किसानों पर असर नहीं पड़ने का दावा
उद्योग का कहना है कि शुल्क मुक्त आयात से किसानों को नुकसान नहीं होगा, क्योंकि अधिकतर किसान अपनी फसल पहले ही बेच चुके होते हैं। पहले भी सीमित अवधि के लिए आयात की अनुमति दी जा चुकी है, जिससे आपूर्ति में सुधार हुआ था।
जल्द निर्णय की मांग
उद्योग ने सरकार से जल्द निर्णय लेने की अपील की है, ताकि आने वाले समय में आपूर्ति संकट और कीमतों में और वृद्धि को रोका जा सके। यदि समय पर कदम नहीं उठाए गए, तो वस्त्र क्षेत्र पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है और निर्यात प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है।
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