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पशुओं में बढ़ता परजीवी प्रकोप, सावधानी और सही उपचार जरूरी

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नई दिल्ली: गर्मी बढ़ते ही मक्खी, मच्छर, चिचड़ और किलनी जैसे परजीवियों का प्रकोप भी पशुओं में बढ़ता है। पशुपालकों के लिए यह समस्या लंबे समय से चिंता का विषय रही है, क्योंकि इन परजीवियों का सीधा असर पशुओं के स्वास्थ्य और उनके उत्पादन पर पड़ता है। गाय और भैंस जैसे दुधारू पशुओं में इनका प्रभाव पड़ने से दूध उत्पादन कम हो जाता है और कई बार पशु गंभीर बीमारियों की चपेट में भी आ जाते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार ये परजीवी केवल बाहरी परेशानी ही नहीं पैदा करते, बल्कि कई बार पशुओं के खून में भी प्रवेश कर जाते हैं और गंभीर रोगों का कारण बनते हैं। पहले यह माना जाता था कि इनका प्रकोप मुख्य रूप से बरसात के मौसम में अधिक होता है, लेकिन अब बदलते मौसम के कारण गर्मियों में भी इनकी संख्या तेजी से बढ़ती देखी जा रही है। इसलिए पशुपालकों को समय रहते सावधानी बरतने और विशेषज्ञों द्वारा बताए गए उपाय अपनाने की सलाह दी जाती है।

परजीवियों के कारण दवाओं का असर कम होने की समस्या

हाल के समय में एक और बड़ी चिंता सामने आई है कि परजीवियों पर दवाओं का असर पहले जैसा नहीं रह गया है। पहले जहां कुछ खास प्रकार की दवाओं से इन रोगों का उपचार आसानी से हो जाता था, वहीं अब कई मामलों में दवाएं प्रभावी नहीं हो पा रही हैं। इसके पीछे परजीवी विरोधी प्रतिरोधकता को प्रमुख कारण माना जा रहा है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि दवाओं का अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग इस समस्या को बढ़ा रहा है। कई बार पशुपालक बिना विशेषज्ञ की सलाह के दवाएं दे देते हैं या फिर निर्धारित मात्रा और समय का पालन नहीं करते। इसके अलावा दवा का पूरा कोर्स न करना भी एक बड़ी वजह बन रहा है। पर्यावरणीय और जैविक कारणों के चलते परजीवियों में प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया होती है, जिससे उनके गुणों में बदलाव आता है और वे दवाओं के प्रति प्रतिरोधक बन जाते हैं।

परजीवी विरोधी प्रतिरोधकता रोकने के उपाय

पशुओं को परजीवियों से बचाने और दवाओं की प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए विशेषज्ञ कई जरूरी सावधानियां अपनाने की सलाह देते हैं। पशुपालकों को चाहिए कि वे केवल पशु चिकित्सक की सलाह पर ही परजीवी विरोधी दवाएं दें। इसके साथ ही चिकित्सक द्वारा बताए गए कृमिनाशक कार्यक्रम का पालन करना जरूरी है।

दवा का पूरा कोर्स करना और निर्धारित मात्रा में ही दवा देना भी बेहद जरूरी है। कम या अधिक मात्रा में दवा देने से उपचार का असर कम हो सकता है। पशुओं का इलाज नीम-हकीमों से करवाने से भी बचना चाहिए और दवा के उपयोग से पहले उसके निर्देशों को ध्यान से पढ़ना चाहिए।

विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि एक ही पशु में साल भर एक ही प्रकार की परजीवी रोधी दवा का लगातार उपयोग न किया जाए। इसके अलावा पशुपालन से जुड़े स्थानों पर जागरूकता कार्यक्रम बढ़ाने और कृमि नियंत्रण का पूरा रिकॉर्ड रखने से भी इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

दवाओं के उपयोग में बरतें विशेष सावधानी

पशुपालकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि चिकित्सक के अलावा किसी अन्य व्यक्ति की सलाह पर पशुओं को दवा न दी जाए। एक ही प्रकार की दवा लगातार देना भी नुकसानदायक हो सकता है। पशुओं को बिना विशेषज्ञ सलाह के दवा देना कई बार बीमारी को और जटिल बना सकता है। साथ ही अपने अनुभव के आधार पर दवा खरीदकर पशुओं को खिलाने से बचना चाहिए। सही समय पर उचित उपचार और सावधानी अपनाकर ही पशुओं को इन परजीवियों से सुरक्षित रखा जा सकता है, जिससे उनकी सेहत और उत्पादन दोनों बेहतर बनाए रखे जा सकते हैं।

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