नई दिल्ली: केंद्र सरकार एक बार फिर उर्वरक सब्सिडी को सीधे किसानों के बैंक खातों में स्थानांतरित करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इस प्रस्तावित व्यवस्था को “ट्रू डीबीटी” मॉडल कहा जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी, कालाबाजारी पर रोक लगेगी और किसान अपनी आवश्यकता के अनुसार उर्वरक का चयन कर सकेंगे। हालांकि, खेती पर अत्यधिक निर्भर राज्यों में शामिल पंजाब में इस प्रस्ताव को लेकर गहरी आशंका जताई जा रही है।
मौजूदा व्यवस्था में किसान यूरिया जैसी खाद तय सब्सिडी दर पर खरीदते हैं और सरकार सब्सिडी की राशि सीधे कंपनियों को देती है। उदाहरण के तौर पर 45 किलो यूरिया की बोरी किसान को लगभग 265 से 270 रुपये में मिलती है, जबकि इसकी वास्तविक लागत करीब 2,400 रुपये बताई जाती है। नए मॉडल में किसान को पहले पूरी बाजार कीमत चुकानी पड़ सकती है और बाद में सब्सिडी की राशि उसके खाते में जमा होगी।
पंजाब में लागत बढ़ने का डर
पंजाब देश के उन राज्यों में है जहां उर्वरक की खपत सबसे अधिक है। धान-गेहूं चक्र वाली खेती में प्रति एकड़ औसतन दो बोरी यूरिया का उपयोग होता है। मौजूदा व्यवस्था में एक एकड़ पर यूरिया का खर्च करीब 540 रुपये बैठता है, लेकिन ट्रू डीबीटी लागू होने पर यही खर्च लगभग 4,800 रुपये तक पहुंच सकता है। यही बड़ा अंतर किसानों की चिंता का कारण बना हुआ है।
छोटे और सीमांत किसानों के सामने बुवाई के समय पहले से ही बीज, डीजल, मजदूरी और कीटनाशकों का भारी खर्च होता है। ऐसे में खाद के लिए हजारों रुपये अग्रिम चुकाना उनके लिए मुश्किल साबित हो सकता है। किसान नेताओं का कहना है कि इससे किसानों की निर्भरता फिर से आढ़तियों और गैर-औपचारिक कर्ज पर बढ़ सकती है।
सब्सिडी में कटौती की आशंका
किसान संगठनों और कृषि विशेषज्ञों को उर्वरक सब्सिडी को लेकर आशंका है कि यह बदलाव केवल भुगतान की पद्धति तक सीमित नहीं रहेगा। उनका मानना है कि भविष्य में सब्सिडी की राशि में कटौती, देरी या सीमा तय की जा सकती है। वे उदाहरण देते हैं कि अन्य योजनाओं में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण लागू होने के बाद सब्सिडी का दायरा धीरे-धीरे सिमट गया। कुछ विशेषज्ञ अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों और वित्तीय दबावों को भी संभावित कारण मानते हैं। उनका तर्क है कि दीर्घकाल में कृषि इनपुट सब्सिडी को सीमित करने की दिशा में यह पहला कदम हो सकता है।
किराएदार किसानों के लिए चुनौती
पंजाब में बड़ी संख्या में किसान किराए की जमीन पर खेती करते हैं। भूमि रिकॉर्ड प्रायः जमीन मालिक के नाम पर होते हैं। किसान संगठनों का कहना है कि यदि सब्सिडी को भूमि रिकॉर्ड से जोड़ा गया तो वास्तविक खेती करने वाले को लाभ न मिलकर जमीन मालिक को मिल सकता है।
इसके अलावा बाढ़ या कटाव से प्रभावित क्षेत्रों में पात्रता तय करना भी जटिल हो सकता है। किसानों का कहना है कि जब तक वास्तविक खेती करने वालों की पहचान की मजबूत व्यवस्था नहीं बनाई जाती, तब तक ट्रू डीबीटी मॉडल कई जरूरतमंद किसानों को लाभ से वंचित कर सकता है। केंद्र सरकार इसे किसानों को सशक्त बनाने और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में बड़ा सुधार बता रही है, जबकि पंजाब के किसान इसे नकदी संकट, कर्ज बढ़ने और उर्वरक सब्सिडी के भविष्य पर संभावित खतरे के रूप में देख रहे हैं।
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