पशुपालन

दूध उत्पादन में भारत अव्वल, फिर भी डेयरी सेक्टर में चारा व लागत बड़ी चुनौती

Milk production in India

नई दिल्ली: वर्ष 2024-25 में देश में कुल 25 करोड़ टन दूध का उत्पादन दर्ज किया गया है। इस उपलब्धि के साथ दूध उत्पादन में भारत ने दो बड़ी कामयाबियां अपने नाम की हैं। एक, कुल दूध उत्पादन के मामले में भारत विश्व में पहले स्थान पर है और दूसरी, दुनिया में गाय के दूध का सबसे अधिक उत्पादन भी भारत में ही होता है। इसके बावजूद भारतीय डेयरी सेक्टर दो बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। पहली चुनौती डेयरी उत्पादों का निर्यात और दूसरी प्रति पशु दूध उत्पादन में ठहराव।

डेयरी विशेषज्ञों के अनुसार, डेयरी उत्पादों के निर्यात में बाधा की सबसे बड़ी वजह उत्पादन लागत का अधिक होना है, जबकि प्रति पशु दूध उत्पादन न बढ़ पाने का मुख्य कारण पशुओं को मिलने वाले चारे की कमी है। एनिमल न्यूट्रीशन एक्सपर्ट का कहना है कि यदि सभी दुधारू पशुओं को संतुलित और पौष्टिक चारा उपलब्ध कराया जाए, तो प्रति पशु दूध उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी संभव है।

देश में चारे की भारी कमी

डेयरी एक्सपर्ट के मुताबिक देश में हरा चारा, सूखा चारा और मिनरल्स—तीनों तरह के चारे की कमी 25 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। इसी कारण दूध और दूध से बने उत्पाद लगातार महंगे होते जा रहे हैं। महंगे उत्पादों के चलते भारतीय डेयरी प्रोडक्ट अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं। चारे की कमी का असर सीधे पशुओं के पोषण और उत्पादकता पर पड़ रहा है। यही वजह है कि नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (NDDB) भी “फ्यूचर रोडमैप ऑफ इंडियन डेयरी सेक्टर” विषय पर गहन मंथन कर चुका है और चारा प्रबंधन को डेयरी सेक्टर की सबसे अहम कड़ी माना गया है।

डेयरी लागत कम करने के उपाय

एनिमल न्यूट्रीशन और डेयरी एक्सपर्ट का कहना है कि डेयरी सेक्टर में लागत घटाने पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। इसके लिए पशुओं के पोषण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और दूध उत्पादन की दक्षता बढ़ाने पर फोकस करना होगा। विशेषज्ञों का सुझाव है कि चारे की कमी या आपात स्थिति में सप्लाई बनाए रखने के लिए क्षेत्रीय चारा बैंक और स्टोरेज गोदाम स्थापित किए जाएं। इसके साथ ही गुणवत्ता वाले चारे और बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए राज्यवार योजनाएं बनाई जानी चाहिए।

घरेलू चारा उत्पादन पर जोर

डेयरी एक्सपर्ट का मानना है कि चारा बीजों के आयात को कम करते हुए बरसीम जैसी फलीदार चारा फसलों की घरेलू उपलब्धता बढ़ानी चाहिए। गैर-वन बंजर भूमि, चरागाह भूमि और सामुदायिक जमीन का उपयोग हरे चारे की खेती के लिए किया जा सकता है, जिससे चारे की कमी को काफी हद तक दूर किया जा सके।

चारा और डेयरी को लेकर विशेषज्ञों की राय

विशेषज्ञों ने चारा और डेयरी सेक्टर को मजबूत करने के लिए कई अहम सुझाव दिए हैं। चारा बीज प्रोसेसिंग और स्टोरेज की सुविधाओं का विस्तार किया जाए। अधिक पोषण मूल्य वाली चारा फसलों के विकास के साथ-साथ मीथेन उत्सर्जन को कम करने पर भी काम हो। इसके अलावा अधिक चारा उत्पादक क्षेत्रों से कम चारे वाले क्षेत्रों तक चारे के परिवहन के लिए अलग ट्रांसपोर्ट पॉलिसी बनाई जाए। फसल अवशेषों के ब्लॉक, गांठ, टीएमआर और छर्रों के परिवहन पर प्रोत्साहन दिया जाए।

दूध उत्पादन की दक्षता बढ़ाने के लिए सटीक फीडिंग तकनीकों को अपनाने, गुणवत्तापूर्ण फीड उत्पादन सुनिश्चित करने और दूषित पदार्थों पर नियंत्रण के लिए सख्त नियम बनाने की जरूरत बताई गई है। साथ ही चारा आधारित एफपीओ को एक मॉडल के रूप में विकसित कर अन्य क्षेत्रों में भी लागू करने पर जोर दिया गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर पर चारा का ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बनाकर डेटाबेस मैनेजमेंट और सूचना का आदान-प्रदान किया जाए, तो डेयरी सेक्टर की कई समस्याओं का समाधान संभव है। इससे न केवल लागत घटेगी, बल्कि भारत की डेयरी अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती मिलेगी।

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