नई दिल्ली: रबी सीजन की प्रमुख दलहनी फसल चना देश के लाखों किसानों की आमदनी का अहम जरिया है। अच्छी पैदावार की उम्मीद में किसान खेतों में मेहनत करते हैं, लेकिन मौसम में उतार-चढ़ाव के साथ कीटों का बढ़ता प्रकोप चने की फसल के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, समय रहते कीटों की पहचान और सही रोकथाम न होने पर किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। चना की फसल में खासतौर पर फली छेदक (इल्ली), दीमक और कटुआ जैसे कीट फूल, फलियों और शुरुआती अवस्था में पौधों को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं।
फली छेदक कीट से चने की पैदावार पर असर
फली छेदक कीट चने की सबसे हानिकारक कीटों में से एक है। इसके वयस्क को पतिंगा कहा जाता है, जबकि इसके लार्वा पौधों के मुलायम तनों और पत्तियों को खाते हैं। जब फसल में फलियां आने लगती हैं, तो ये कीट फलियों को छेदकर अंदर के दानों को नुकसान पहुंचाते हैं। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, फली छेदक के अधिक प्रकोप से चने की पैदावार में 30 से 40 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है।
फली छेदक कीट से बचाव के उपाय
फली छेदक कीट से बचाव के लिए किसानों को एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाने की सलाह दी जाती है। इसके तहत फेरोमोन ट्रैप लगाकर नर कीटों को पकड़ा जा सकता है। नीम आधारित कीटनाशकों और जैविक नियंत्रण जैसे एनपीबी (NPB) और मित्र कीटों का प्रयोग भी प्रभावी माना जाता है। अगर कीटों का प्रकोप बहुत ज्यादा बढ़ जाए और तुरंत नियंत्रण जरूरी हो, तो किसान इंडोसल्फान 35 EC, क्वीनालफॉस 20 EC, क्लोरोपाइरीफॉस 20 EC या प्रोफेनोफॉस 50 EC का उचित मात्रा में पानी के साथ घोल बनाकर छिड़काव कर सकते हैं।
चने की फसल में दीमक का खतरा
दीमक चने की फसल में बुवाई से लेकर कटाई तक नुकसान पहुंचाने वाला एक गंभीर कीट है। यह खासकर सूखे और कम नमी वाले क्षेत्रों में ज्यादा नुकसान करती है। दीमक के प्रकोप से पौधे पीले पड़ने लगते हैं, मुरझा जाते हैं और अंततः सूख जाते हैं। दीमक जड़ और तने को अंदर से खाकर खोखला कर देती है, जिससे चने के उत्पादन में 30 से 60 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है।
दीमक से बचाव के प्रभावी तरीके
दीमक से बचाव के लिए किसानों को पूरी तरह सड़ी हुई गोबर खाद का प्रयोग करना चाहिए। जैविक नियंत्रण के तहत खेत में गड्ढे खोदकर विवेरिया वैसियाना नामक फफूंद के स्पोर को ताजे गोबर में मिलाकर डालना लाभकारी माना जाता है। अगर दीमक का प्रकोप अधिक हो जाए, तो रासायनिक नियंत्रण के तौर पर इंडोसल्फान 35 EC या क्लोरोपाइरीफॉस 20 EC को सिंचाई के पानी या बालू में मिलाकर खेत में सिंचाई से पहले छिड़काव किया जा सकता है।
कटुआ कीट से फसल को होने वाला नुकसान
चना की फसल में कटुआ कीट पौधों को जमीन की सतह से काट देता है, जिससे अंकुरण रुक जाता है और उपज पर सीधा असर पड़ता है। इस कीट के प्रकोप से दानों का विकास रुक जाता है और फलियां खोखली रह जाती हैं। कटुआ कीट रात के समय सक्रिय रहता है और दिन में मिट्टी के ढेलों या घास के नीचे छिपा रहता है, जिससे इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है।
कटुआ कीट से बचाव के उपाय
कटुआ कीट से बचाव के लिए किसानों को खेत की मेड़ पर सूरजमुखी जैसी आकर्षक फसलें लगानी चाहिए। खेत में सूखी घास के छोटे ढेर बनाकर कीटों को दिन में छिपने का स्थान मिलता है, जिन्हें सुबह इकट्ठा कर नष्ट किया जा सकता है। इसके अलावा, वयस्क कीट रोशनी की ओर आकर्षित होते हैं, इसलिए लाइट ट्रैप का इस्तेमाल किया जा सकता है। नीम तेल जैसे जैविक कीटनाशकों का प्रयोग भी कटुआ कीट के नियंत्रण में सहायक माना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर निगरानी और सही उपाय अपनाकर किसान चने की फसल को कीटों से बचा सकते हैं और रबी सीजन में बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं।
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