मथुरा स्थित केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (CIRG) के प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. आर.एस. पवैया का कहना है कि मानसून के मौसम में बकरियां दो प्रमुख पेट संबंधी बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं। इनमें से एक बीमारी को बरसात से पहले टीका लगवाकर नियंत्रित किया जा सकता है, जबकि दूसरी से बचाव के लिए बरसात के दौरान विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, बकरी की सेहत का अंदाजा उसकी आंखों, मेंगनी और पेशाब से लगाया जा सकता है। आंखों में बदलाव पेट में पाए जाने वाले हिमोकस पैरासाइट की पहचान में मदद करता है। यह परजीवी बकरी के पेट में पलकर खून चूसता है, जिससे खून की कमी हो जाती है। स्वस्थ बकरी की आंखें लाल-गुलाबी और चमकदार होती हैं, लेकिन हिमोकस की मौजूदगी में ये हल्की गुलाबी हो जाती हैं और गंभीर स्थिति में सफेद पड़ने लगती हैं।
मेंगनी का आकार और रंग भी बीमारी का संकेत देते हैं। स्वस्थ बकरी की मेंगनी गोल और चमकदार होती है, जबकि चिपकी हुई, गुच्छेदार या पेस्ट जैसी मेंगनी डायरिया या आंत में संक्रमण का लक्षण हो सकती है। इसके अलावा बकरी के पेशाब का रंग भी उसकी सेहत का पैमाना है। हल्का पीला यूरिन सामान्य माना जाता है, लेकिन गहरा पीला रंग पानी की कमी का संकेत देता है। पेशाब में लालपन मूत्रमार्ग में चोट या संक्रमण की ओर इशारा करता है, जबकि कॉफी रंग का यूरिन खून में संक्रमण का लक्षण है। डॉ. पवैया का कहना है कि बरसात से पहले टीकाकरण, साफ-सुथरे बाड़े का रखरखाव, पर्याप्त पानी और पौष्टिक चारा उपलब्ध कराना, तथा रोजाना बकरियों की आंख, मेंगनी और पेशाब पर नजर रखना ही इन मौसमी बीमारियों से बचाव का सबसे कारगर तरीका है।
