नई दिल्ली: देश में बढ़ते जलवायु संकट और रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों के बीच संसद की प्राक्कलन समिति ने टिकाऊ और प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए एक विस्तृत कार्य योजना पेश की है। इस रिपोर्ट में कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है और इन्हें बदलाव के प्रमुख वाहक के रूप में स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम उठाने का सुझाव दिया गया है। समिति ने कृषि मंत्रालय को जैविक और प्राकृतिक खेती को आर्थिक रूप से अपनाने योग्य बनाने की सलाह दी है, ताकि किसान पारंपरिक खेती के बजाय पर्यावरण और स्वास्थ्य के अनुकूल विकल्पों की ओर रुख कर सकें। इस दिशा में एक अहम सिफारिश यह भी की गई है कि चुनिंदा जैविक फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के दायरे में लाया जाए, ताकि किसानों को उनके उत्पादों का उचित मूल्य मिल सके।
प्रस्तावित रिपोर्ट में कहा गया है कि जैविक उत्पादों के लिए वर्तमान में जो 20 से 30 प्रतिशत प्रीमियम मूल्य दिया जाता है, उसे औपचारिक रूप से एमएसपी के जरिए संरचित किया जाना चाहिए। इससे किसानों को उनके जैविक खेती के प्रयासों के लिए बेहतर मुआवजा सुनिश्चित किया जा सकेगा। हालांकि रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जैविक खेती को अपनाने में कई चुनौतियां सामने आती हैं – जैसे खेती की अधिक लागत, भूमि की सीमित उपलब्धता, जैविक खादों की कमी और बाजार तक पहुंच में कठिनाई। खासतौर पर उच्च गुणवत्ता वाले जैविक इनपुट्स की कमी उत्पादकता को प्रभावित कर रही है, जिसे दूर करना अत्यंत आवश्यक है।
इस संदर्भ में समिति ने कृषि मंत्रालय से अनुरोध किया है कि वह पूर्वोत्तर राज्यों के लिए चल रही ‘जैविक मूल्य श्रृंखला विकास मिशन’ (MOVCDNER) जैसी योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता और बुनियादी ढांचे का विस्तार करे। साथ ही यह भी सुझाव दिया गया है कि जैविक खेती के लिए मानव श्रम पर आधारित कार्यप्रणाली को सब्सिडी दी जाए, क्योंकि यह यंत्रों की तुलना में अधिक रोजगार सृजन कर सकती है। इसके साथ ही जैविक खादों की आपूर्ति सुनिश्चित करने और उनकी गुणवत्ता में सुधार के लिए भी आवश्यक कदम उठाने की जरूरत बताई गई है। समिति ने यह भी अनुशंसा की है कि बाजार तक किसानों की पहुंच को बेहतर बनाने के लिए देश के प्रमुख शहरी केंद्रों में जैविक उत्पादों की बिक्री के लिए समर्पित रिटेल स्टोर खोले जाएं, ताकि उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध स्थापित हो सके और जैविक उत्पादों को उचित दाम मिल सके।
जलवायु परिवर्तन से कृषि पर पड़ने वाले प्रभावों के संदर्भ में समिति ने ‘राष्ट्रीय नवाचार कार्यक्रम: जलवायु अनुकूल कृषि’ (NICRA) के अंतर्गत कृषि मंत्रालय के प्रयासों की सराहना की है। रिपोर्ट के अनुसार, इस पहल ने जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील फसल किस्मों के विकास और किसानों को बदलते मौसम के अनुरूप ढलने में मदद करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। तकनीक के क्षेत्र में भी समिति ने कृषि मंत्रालय के प्रयासों की प्रशंसा की है, विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित पूर्वानुमान मॉडल्स को खेती से जोड़ने की दिशा में उठाए गए कदमों के लिए। समिति का मानना है कि एआई और मशीन लर्निंग तकनीकों के इस्तेमाल से किसानों को मौसम की सटीक जानकारी, कीट प्रकोप की पूर्व चेतावनी और फसल की सेहत पर रीयल टाइम डेटा मिल सकता है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होगी।
साथ ही समिति ने सुझाव दिया है कि दूरदराज़ और वंचित क्षेत्रों के किसानों को इन डिजिटल तकनीकों का लाभ मिल सके, इसके लिए सरकार को तकनीकी कंपनियों, कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के साथ साझेदारी करनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि सभी किसान, चाहे वे देश के किसी भी हिस्से में हों, एआई आधारित कृषि समाधान से लाभान्वित हो सकें। कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट न केवल टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने की दिशा में एक ठोस नीति दस्तावेज़ है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि जैविक खेती को एक आर्थिक रूप से लाभदायक और तकनीकी रूप से समर्थ विकल्प बनाने की दिशा में अब निर्णायक पहल की जा रही है।
