मानसून जहां किसानों के लिए राहत लेकर आता है, वहीं यह मौसम पशुपालकों के लिए चिंता का कारण भी बनता है। नमी और ठंडक के साथ बरसात का मौसम जानवरों में बीमारियों के खतरे को भी बढ़ा देता है। इस समय सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक तेजी से फैलने वाली बीमारी ‘गला घोंटू’ है, जो खासतौर पर गाय और भैंस जैसे दुधारू पशुओं को अपनी चपेट में लेती है। ‘गला घोंटू’ एक बैक्टीरियल संक्रमण है, जिसमें पशु के गले में सूजन आ जाती है और वह ठीक से सांस नहीं ले पाता। पशु चिकित्सकों के अनुसार यह बीमारी भैंसों में अधिक देखी जाती है, लेकिन गायें भी इससे अछूती नहीं हैं। समय पर इलाज न मिलने पर यह बीमारी जानलेवा साबित हो सकती है।
इस बीमारी को ‘गला घोंटू’ कहा जाता है क्योंकि इसमें गले में सूजन के चलते जानवरों के गले से घर्र-घर्र जैसी आवाजें आने लगती हैं और उनकी सांस लेने की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित होती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी ने उनका गला दबा दिया हो। पशु चिकित्सकों का कहना है कि यदि कोई पशु खाना-पीना छोड़ दे, उसका शरीर गर्म हो जाए, कान नीचे झुक जाएं और गले में सूजन के साथ तेज आवाजें आएं, तो यह ‘गला घोंटू’ के स्पष्ट लक्षण हो सकते हैं। ऐसे में बिना देर किए इलाज कराना जरूरी हो जाता है।
इस बीमारी से बचाव का सबसे असरदार तरीका है टीकाकरण। खासकर बरसात के मौसम में यह बीमारी ज्यादा फैलती है, इसलिए समय पर वैक्सीनेशन कराना जरूरी है। इसी को ध्यान में रखते हुए सुल्तानपुर जिले में पशुपालन विभाग ने बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान चलाया है। विभाग ने 5 लाख 8 हजार पशुओं को टीका लगाने का लक्ष्य तय किया है, जिसमें से अब तक करीब ढाई लाख पशुओं को वैक्सीन दी जा चुकी है। पशुपालकों को सलाह दी गई है कि बरसात के मौसम में पशुओं को साफ-सुथरी और सूखी जगह पर रखें। बारिश के पानी से उन्हें बचाएं और हल्का गुनगुना पानी पिलाएं। चारे और पानी के बर्तनों की सफाई का विशेष ध्यान रखें। बीमार पशु को अन्य पशुओं से अलग करें और तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
पशुपालन विभाग की अपील है कि अगर किसी भी पशु में गला घोंटू के लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सालय में इलाज कराएं। यह बीमारी जितनी खतरनाक है, उतनी ही आसानी से रोकी भी जा सकती है। बशर्ते समय रहते सावधानी बरती जाए। इस मानसून पशुओं की सेहत को लेकर लापरवाही महंगी पड़ सकती है। थोड़ी सी सतर्कता, साफ-सफाई और टीकाकरण से ‘गला घोंटू’ जैसी गंभीर बीमारी से बचाव संभव है। सरकार और विभाग दोनों अपने स्तर पर सक्रिय हैं, अब ज़रूरत है कि पशुपालक भी समय रहते जरूरी कदम उठाएं।
