कृषि समाचार

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने किसानों के लिए डायरेक्ट सब्सिडी की वकालत की, अप्रत्यक्ष लाभ को बताया कम प्रभावी

नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने मंगलवार को किसानों के हित में एक बार फिर डायरेक्ट सब्सिडी की वकालत की। उन्होंने कहा कि अप्रत्यक्ष रूप से दी जाने वाली सब्सिडी से किसानों को उतने प्रभावी लाभ नहीं मिलते, जितने सीधे तौर पर लाभ पहुंचाने से मिल सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अप्रत्यक्ष सब्सिडी व्यवस्था में अक्सर “लीकेज” की समस्या होती है, जिससे किसानों को पूरा फायदा नहीं मिल पाता।

धनखड़ दिल्ली में पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा से उनके जन्मदिन के अवसर पर मुलाकात करने पहुंचे थे। इस भेंट के दौरान उन्होंने देवेगौड़ा को जन्मदिन की शुभकामनाएं देने के साथ-साथ कृषि और किसानों से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की। उपराष्ट्रपति ने इस मुलाकात को प्रेरणादायक बताया और कहा कि वे किसानों के मुद्दों को उठाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

उपराष्ट्रपति सचिवालय की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, धनखड़ ने देवेगौड़ा से बातचीत के दौरान कहा कि किसान न सिर्फ उनके दिल में हैं, बल्कि दिमाग में भी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश की अर्थव्यवस्था, राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक ढांचे में किसानों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है, इसलिए उनके मुद्दों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसानों की सेवा उनके लिए किसी पूजा से कम नहीं है और यही वजह है कि वे बार-बार इस विषय को राष्ट्रीय मंचों पर उठा रहे हैं।

धनखड़ ने कहा कि किसानों को सब्सिडी देने का सबसे प्रभावी तरीका यही है कि सहायता सीधे उनके खातों में ट्रांसफर की जाए। इस व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ेगी और बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी, जिससे किसान को वास्तविक लाभ मिलेगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि यदि इस दिशा में गंभीरता से काम किया गया, तो किसानों का जीवन बदल सकता है। उपराष्ट्रपति ने देवेगौड़ा से बातचीत के बाद कहा कि वह इस मुलाकात से नई ऊर्जा और प्रेरणा लेकर निकल रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे चुनौतियों को पीछे छोड़कर जनसेवा के अपने संकल्प को और मजबूत करेंगे, विशेषकर ग्रामीण भारत और किसानों के कल्याण के लिए।

धनखड़ पहले भी कई मौकों पर यह कह चुके हैं कि कृषि क्षेत्र में सुधार की सबसे जरूरी कड़ी यह है कि किसानों को मिलने वाली हर प्रकार की सहायता सीधे तौर पर दी जाए, ताकि उनका जीवन स्तर सुधरे और देश की खाद्य सुरक्षा भी मजबूत हो। उनकी इस सोच को अब व्यापक समर्थन मिलने लगा है और नीतिगत स्तर पर भी इस दिशा में कुछ कदम उठाए जा रहे हैं।

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