नई दिल्ली: खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ अरहर यानी तुअर की खेती किसानों के लिए आमदनी का अच्छा जरिया बन सकती है। बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद सही किस्म का चयन, समय पर बुवाई और वैज्ञानिक तरीके अपनाकर किसान बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं। खासतौर पर कम अवधि में तैयार होने वाली अरहर की किस्में किसानों के लिए उपयोगी हैं, क्योंकि इनकी कटाई जल्दी हो जाती है और इसके बाद रबी फसलों की समय पर बुवाई की जा सकती है।
कम अवधि में तैयार होती हैं अरहर की ये किस्में
कृषि वैज्ञानिकों और अनुसंधान संस्थानों की ओर से विकसित की गई कई अरहर किस्में कम समय में तैयार होती हैं और अच्छी उपज देती हैं। जेकेएम 189 देर से बुवाई करने वाले किसानों के लिए उपयोगी किस्म मानी जाती है। इसकी फलियां हरी होती हैं और उन पर काली धारियां दिखाई देती हैं, जबकि दाने बड़े, लाल और भूरे रंग के होते हैं। यह किस्म करीब 20 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज दे सकती है। पूसा अगेती भी जल्दी तैयार होने वाली किस्म है, जो करीब 120 से 130 दिनों में पक जाती है। इसके दाने मोटे होते हैं और इससे करीब एक टन प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है।
120 से 150 दिनों में तैयार हो जाती हैं कुछ किस्में
आईसीपीएल 87 करीब 130 से 150 दिनों में तैयार होने वाली किस्म है। इसकी फलियां मोटी और लंबी होती हैं तथा गुच्छों में लगती हैं, जिससे एक साथ पकने के कारण कटाई आसान हो जाती है। इसकी औसत उपज 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक बताई जाती है। पूसा 992 को वर्ष 2005 में विकसित किया गया था। इसके दाने भूरे, मोटे, चमकदार और गोल होते हैं। यह किस्म 120 से 140 दिनों में तैयार हो जाती है और प्रति एकड़ करीब 6 क्विंटल तक उपज दे सकती है। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में इसकी खेती की जाती है। वहीं आईपीए 203 को विभिन्न रोगों के प्रति अच्छी प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्म माना जाता है। इससे करीब 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज मिल सकती है और इसकी बुवाई के लिए जून का समय उपयुक्त माना जाता है।
अरहर की बुवाई से पहले खेत की तैयारी जरूरी
अरहर की अच्छी फसल के लिए बुवाई से पहले खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए। इसके बाद कल्टीवेटर से दो से तीन बार जुताई करके पाटा चलाएं और खेत को समतल कर लें। खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था होना बेहद जरूरी है, क्योंकि पानी जमा होने से अरहर की फसल को नुकसान पहुंच सकता है और पौधे मुरझाने लगते हैं। जिन खेतों में जलभराव की आशंका रहती है, वहां मेड़ों पर अरहर की बुवाई करना बेहतर विकल्प हो सकता है। अरहर को सामान्य तौर पर अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए खेत में जलभराव से बचाव पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
इस अवधि में बुवाई करना फायदेमंद
कम अवधि वाली अरहर की किस्मों की बुवाई 15 जून से 30 जून के बीच पूरी कर लेना उचित माना जाता है। समय पर बुवाई करने से फसल की कटाई भी जल्दी हो सकती है और इसके बाद खेत को रबी फसलों के लिए समय पर तैयार किया जा सकता है। सही किस्म का चयन, उचित खेत प्रबंधन, समय पर बुवाई और फसल की नियमित देखभाल अपनाकर किसान खरीफ सीजन में अरहर से बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं और अपनी खेती की आय बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
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