खेती-किसानी

धान की खेती में नया विकल्प बनी ‘सूखी बुवाई’ की तकनीक, कम बारिश और मजदूरों की कमी में किसानों के लिए साबित हो रही है फायदेमंद

नई दिल्ली: देश के लाखों किसान आज भी धान की पारंपरिक रोपाई पद्धति पर निर्भर हैं, जिसमें खेतों को पानी से भरकर रोपाई की जाती है। हालांकि बदलते मौसम, जलवायु परिवर्तन, मजदूरों की कमी और समय पर बारिश न होने जैसी समस्याएं अब इस पारंपरिक प्रणाली को चुनौती दे रही हैं। ऐसे समय में वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को एक नया और व्यवहारिक समाधान सुझाया है – ‘सूखी विधि से सीधी बुवाई’, जिसे अब कई राज्यों के किसान तेजी से अपना रहे हैं। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में यह तकनीक बेहद लोकप्रिय हो रही है और इसके अच्छे परिणाम भी सामने आए हैं। किसानों को न सिर्फ पानी की बचत हो रही है, बल्कि मजदूरों पर निर्भरता भी कम हुई है और उत्पादन में भी सुधार देखने को मिला है।

क्या है सूखी बुवाई विधि?

‘सूखी बुवाई’ यानी ड्राय डायरेक्ट सीडिंग राइस (Dry DSR) एक ऐसी तकनीक है जिसमें धान के बीजों को सीधे सूखी मिट्टी में बोया जाता है, यानी खेत में पानी भरने की जरूरत नहीं होती। इस विधि से किसान बारिश का इंतजार किए बिना बुवाई शुरू कर सकते हैं। यदि खेत की मिट्टी की समय से तैयारी कर ली गई हो और उर्वरकों का सही प्रबंधन किया गया हो, तो यह पद्धति कम खर्च में अधिक उत्पादन देने में सक्षम है।

वैज्ञानिकों की राय और तकनीकी पहलू

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि कम बारिश या अनिश्चित मौसम में किसान सूखे खेत की जुताई करके सीड ड्रिल मशीन या ब्रॉडकास्टिंग तकनीक से आसानी से बीज बो सकते हैं। ब्रॉडकास्टिंग मैथड में प्रति हेक्टेयर करीब 80 किलो बीज की जरूरत होती है और यह पद्धति छोटी जोत वाले किसानों के लिए भी किफायती है। वहीं सीड ड्रिल मशीन से एक एकड़ खेत में मात्र 30 किलो बीज ही पर्याप्त होता है। सीड ड्रिल मशीन की खासियत यह है कि बीज खेत में 20 सेंटीमीटर की दूरी पर नौ समानांतर लाइनों में बोए जाते हैं। बीजों की गहराई और अंतर एक जैसा होने के कारण अंकुरण बेहतर होता है और पौधों का विकास भी एक समान होता है। यह पद्धति किसानों का न केवल समय बचाती है बल्कि सिंचाई और मजदूरी जैसे खर्चों को भी काफी हद तक घटा देती है।

खरपतवार: एक चुनौती, लेकिन समाधान मौजूद

सीधी बुवाई के बाद खेतों में खरपतवार की समस्या आम है, लेकिन इसका समाधान भी वैज्ञानिकों ने सुझाया है। खरपतवार नियंत्रण के लिए दो चरणों में रासायनिक छिड़काव करने की सलाह दी जाती है। पहला छिड़काव बुवाई के 3 दिन के भीतर पेंडीमेथिलिन (5 मि.ली./लीटर पानी) का छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव बुवाई के 15 से 20 दिन बाद सपाइयों बैग सोडियम (80 ग्राम/लीटर पानी) का प्रयोग करें। इन उपायों से खेत को घास और खरपतवार से मुक्त रखा जा सकता है, जिससे फसल की वृद्धि निर्बाध रूप से होती है।

कम लागत, ज्यादा मुनाफा

सूखी बुवाई विधि न केवल सिंचाई की जरूरत को कम करती है, बल्कि खेत में लगातार काम करने वाले मजदूरों की आवश्यकता भी घट जाती है। किसान अगर इस तकनीक के साथ उर्वरकों का सही समय पर प्रयोग करें, तो फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में शानदार सुधार देखा जा सकता है। इसके साथ ही फसल समय से तैयार हो जाती है, जिससे बाजार में अच्छी कीमत मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है।

वक्त की जरूरत है तकनीकी बदलाव

हर साल मौसम की अनिश्चितता, बारिश में देरी और मजदूरों की कमी जैसी समस्याओं से परेशान किसानों के लिए यह तकनीक किसी संजीवनी से कम नहीं। यह पारंपरिक धान की खेती की तुलना में न सिर्फ ज्यादा कुशल, बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी टिकाऊ विकल्प के रूप में उभर रही है। सूखी बुवाई की तकनीक खेती के बदलते परिदृश्य में किसानों को एक नया रास्ता दिखा रही है। यदि इसे सही तरीके से अपनाया जाए तो यह खेती की लागत घटाकर लाभ बढ़ाने का मजबूत माध्यम बन सकती है। अब जरूरत है कि अधिक से अधिक किसान इस पद्धति की ओर कदम बढ़ाएं और वैज्ञानिक खेती के लाभों का पूरा उपयोग करें।

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