नई दिल्ली: इस साल देश में धान की बंपर बुवाई हुई है, जो किसानों और उपभोक्ताओं के लिए एक सकारात्मक खबर है। लेकिन कृषि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अच्छी पैदावार के लालच में कई किसान यूरिया का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं। अधिकतर किसानों को यह जानकारी नहीं होती कि फसल को कब और कितनी मात्रा में यूरिया की जरूरत है। इसके कारण खेती की लागत बढ़ने के साथ-साथ फसल पर कीट और बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। जैसे इंसान के लिए जरूरत से ज्यादा खाना हानिकारक होता है, वैसे ही पौधों के लिए भी जरूरत से ज्यादा खाद जहर साबित हो सकती है। अधिक नाइट्रोजन से पौधे नरम हो जाते हैं, जिससे कीटों का हमला आसान हो जाता है और मिट्टी की सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है, नतीजतन फसल की गुणवत्ता गिरने लगती है।
इस समस्या का एक सरल, सस्ता और कारगर समाधान है लीफ कलर चार्ट (एलसीसी)। यह एक छोटी प्लास्टिक की पट्टी होती है, जिस पर हल्के पीले-हरे से गहरे हरे तक अलग-अलग रंग के शेड बने होते हैं और उन्हें नंबर दिए गए होते हैं। धान की पत्ती का रंग चार्ट से मिलाकर यह तय किया जा सकता है कि पौधे को नाइट्रोजन की आवश्यकता है या नहीं। यह चार्ट बाजार में मात्र 50 से 60 रुपये में उपलब्ध है। इसका नियम सीधा है – पत्ती का रंग जितना हल्का होगा, पौधे को नाइट्रोजन की उतनी ज्यादा जरूरत होगी, जबकि गहरे हरे रंग का मतलब है कि पौधे में पर्याप्त नाइट्रोजन मौजूद है और यूरिया डालने की आवश्यकता नहीं है।
लीफ कलर चार्ट का सही इस्तेमाल करने के लिए खेत में कम से कम 10 स्वस्थ और कीट-मुक्त पौधों की सबसे ऊपर वाली, पूरी तरह खुली पत्ती का रंग सुबह 8 से 10 बजे के बीच जांचा जाता है। जांच के दौरान पत्ती पर सीधी धूप नहीं पड़नी चाहिए और इसे छाया में किया जाना चाहिए। यदि 10 में से 6 या उससे अधिक पत्तियों का रंग चार्ट के निर्धारित मान से हल्का हो, तो यूरिया डालने का समय है। खरीफ धान (गैर-बासमती) में लीफ कलर चार्ट का मान 4 या उससे कम होने पर लगभग 60 किलो यूरिया प्रति हेक्टेयर, खरीफ बासमती धान में मान 3 या उससे कम होने पर 50 किलो प्रति हेक्टेयर और सीधी बुवाई वाले गैर-बासमती धान में मान 3 या उससे कम होने पर 50 किलो प्रति हेक्टेयर यूरिया डालने की सिफारिश की जाती है। यह मात्रा एक बार में डालने के लिए है और हर 7 से 10 दिन में पत्तियों का रंग जांचते रहना चाहिए।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि लीफ कलर चार्ट के इस्तेमाल से 20 से 25 प्रतिशत तक यूरिया की खपत कम की जा सकती है। इससे फसल को सही समय पर सही पोषण मिलता है, पैदावार बढ़ती है, कीट और बीमारियों का प्रकोप कम होता है और मिट्टी व पानी का प्रदूषण घटता है। सही समय पर सही मात्रा में यूरिया डालकर किसान न केवल लागत घटा सकते हैं, बल्कि मुनाफा बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दे सकते हैं।
