पटना: बिहार में रबी सीजन के दौरान गेहूं की खेती किसानों के लिए आय का एक प्रमुख साधन है। राज्य में अलग-अलग कृषि जलवायु परिस्थितियों, मिट्टी की प्रकृति और सिंचाई की उपलब्धता के अनुसार कई गेहूं की उन्नत किस्में उगाई जाती हैं। अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए किसानों के लिए जरूरी है कि वे अपने क्षेत्र और बुवाई के समय के हिसाब से सही किस्म का चुनाव करें। खासतौर पर धान की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई में देरी होने पर ऐसी किस्मों का चयन करना चाहिए, जो पछेती बुवाई के लिए उपयुक्त हों।
बिहार के लिए गेहूं की प्रमुख उन्नत किस्में
बिहार पूर्वी भारत के मैदानी कृषि क्षेत्र में आता है। यहां समय पर बुवाई और सिंचित खेती के लिए कई किस्में उपयोगी हैं। इनमें डीबीडब्ल्यू 187, के 0307, एचडी 2824, एचडी 2733 और एचयूडब्ल्यू 468 प्रमुख हैं।
डीबीडब्ल्यू 187 (करण वंदना)
डीबीडब्ल्यू 187 को करण वंदना के नाम से भी जाना जाता है। यह बिहार सहित पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल के मैदानी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्म है। इसकी बुवाई का सही समय सामान्यतः नवंबर का पहला से तीसरा सप्ताह माना जाता है। अनुकूल परिस्थितियों में इसकी संभावित उपज लगभग 60 से 65 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। इस किस्म में पत्ती के रतुआ और पत्ती झुलसा जैसे रोगों के प्रति बेहतर प्रतिरोध क्षमता बताई गई है। इसके दानों में लौह तत्व की अच्छी मात्रा और रोटी बनाने की बेहतर गुणवत्ता भी इसकी खासियत है।
के 0307
के 0307 बिहार और पूर्वी भारत के मैदानी इलाकों में खेती के लिए अनुशंसित किस्मों में शामिल है। इसे मुख्य रूप से समय पर बुवाई और सिंचित परिस्थितियों में उगाया जा सकता है। इस किस्म का चयन करते समय खेत में पर्याप्त नमी, संतुलित पोषण और समय पर सिंचाई का ध्यान रखना जरूरी है। किसानों को स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से इसकी वर्तमान अनुशंसा और बीज की उपलब्धता की जानकारी लेनी चाहिए।
एचडी 2824
एचडी 2824 भी बिहार सहित पूर्वी भारत के लिए बताई गई गेहूं की किस्मों में शामिल है। इसकी खेती समय पर बुवाई और सिंचित परिस्थितियों में की जा सकती है। बेहतर उत्पादन के लिए खेत की तैयारी, उचित बीज दर और फसल की शुरुआती अवस्था में खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
एचडी 2733
एचडी 2733 पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदानी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली किस्मों में शामिल है। इसे नवंबर में समय पर बुवाई के लिए चुना जा सकता है। इस किस्म से बेहतर उत्पादन लेने के लिए किसानों को स्थानीय मौसम और मिट्टी की स्थिति के अनुसार खाद एवं सिंचाई का प्रबंधन करना चाहिए।
एचयूडब्ल्यू 468
एचयूडब्ल्यू 468 भी पूर्वी भारत के लिए अनुशंसित गेहूं की किस्मों में शामिल है। बिहार के किसान इसे अपने क्षेत्र की कृषि परिस्थितियों और सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर चुन सकते हैं। इसकी खेती में प्रमाणित बीज का इस्तेमाल और समय पर बुवाई महत्वपूर्ण है।
देर से बुवाई के लिए कौन सी किस्में बेहतर हैं?
बिहार में धान की कटाई में देरी, खेतों में अधिक नमी या आलू जैसी दूसरी फसलों के कारण कई बार गेहूं की बुवाई दिसंबर तक पहुंच जाती है। ऐसे में सामान्य किस्मों के बजाय पछेती बुवाई के लिए अनुशंसित किस्मों का चुनाव करना बेहतर रहता है।
डीबीडब्ल्यू 316 (करण प्रेमा)
डीबीडब्ल्यू 316 को करण प्रेमा के नाम से जाना जाता है। यह बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र में सिंचित पछेती बुवाई के लिए अनुशंसित किस्म है। धान की देर से कटाई के कारण जिन किसानों को दिसंबर में गेहूं की बुवाई करनी पड़ती है, वे इस किस्म पर विचार कर सकते हैं। पछेती बुवाई में फसल की अवधि और बढ़ते तापमान को ध्यान में रखते हुए उचित प्रबंधन करना जरूरी है।
डीबीडब्ल्यू 14
डीबीडब्ल्यू 14 को भी पछेती बुवाई वाली किस्मों में शामिल किया गया है। किसान इसका चयन अपने क्षेत्र की कृषि सलाह और बीज की उपलब्धता के आधार पर कर सकते हैं। इसकी खेती के दौरान समय पर सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण पर ध्यान देना चाहिए।
एचडी 3118
एचडी 3118 सिंचित पछेती बुवाई के लिए बताई गई किस्मों में शामिल है। बिहार के जिन इलाकों में धान की कटाई देर से होती है, वहां किसान स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेकर इस किस्म की उपयुक्तता की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
कम पानी में खेती के लिए इन किस्मों पर करें विचार
बिहार के कुछ क्षेत्रों में सिंचाई की सीमित सुविधा के कारण गेहूं की फसल को पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता। ऐसी परिस्थितियों में किसानों को कम पानी या असिंचित खेती के लिए अनुशंसित किस्मों की जानकारी लेनी चाहिए। एचडी 2888, के 8027 और सी 306 जैसी किस्मों का उल्लेख शुष्क परिस्थितियों से संबंधित कृषि सलाह में मिलता है। हालांकि, इनकी उपयुक्तता बिहार के सभी जिलों में समान नहीं मानी जा सकती। इसलिए इनका चयन करने से पहले स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेना जरूरी है।
गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए इन बातों का रखें ध्यान
बिहार में गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए समय पर बुवाई सबसे महत्वपूर्ण है। सामान्य परिस्थितियों में नवंबर के पहले से तीसरे सप्ताह तक बुवाई पूरी करने का प्रयास करना चाहिए। समय पर बुवाई के लिए सामान्यतः लगभग 100 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है। कतारों के बीच करीब 20 सेंटीमीटर की दूरी रखना उपयोगी रहता है। पहली सिंचाई बुवाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद, कल्ले निकलने की अवस्था में करनी चाहिए। इसके बाद फसल की जरूरत, मिट्टी में नमी और मौसम के अनुसार सिंचाई करें। पत्ती झुलसा और अन्य रोगों की निगरानी भी नियमित रूप से करनी चाहिए।
किस्म का चुनाव करते समय रखें इन बातों का ध्यान
बिहार में गेहूं की किस्म का चयन करते समय किसान अपने जिले की जलवायु, मिट्टी, सिंचाई की सुविधा और बुवाई के समय को प्राथमिकता दें। समय पर बुवाई के लिए डीबीडब्ल्यू 187 (करण वंदना) एक प्रमुख विकल्प है, जबकि सिंचित पछेती बुवाई के लिए डीबीडब्ल्यू 316 (करण प्रेमा) पर विचार किया जा सकता है। किसानों को हमेशा प्रमाणित बीज खरीदना चाहिए और किसी भी किस्म को बड़े क्षेत्र में लगाने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से उसकी उपयुक्तता की पुष्टि कर लेनी चाहिए।
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