खेती-किसानी

चने की खेती में अच्छी पैदावार के लिए अपनाएं ये तरीके

Follow these methods for good yield in gram cultivation

नई दिल्ली: चना भारत की प्रमुख दलहनी फसलों में से एक है। इसकी खेती मुख्य रूप से रबी मौसम में की जाती है। चने के दानों में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और कई पोषक तत्व पाए जाते हैं। यह मानव आहार के साथ-साथ पशु आहार के लिए भी उपयोगी है। चने की खेती का एक बड़ा लाभ यह है कि इसकी जड़ों में मौजूद गांठों के माध्यम से वायुमंडलीय नाइट्रोजन मिट्टी में स्थिर होती है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है। कम सिंचाई में भी अच्छी पैदावार देने वाली यह फसल किसानों के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, बेहतर उत्पादन के लिए सही किस्म, समय पर बुवाई, बीजोपचार और कीट-रोग प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।

बुवाई का समय और मिट्टी

चने की बुवाई के लिए अक्टूबर के मध्य से नवंबर के मध्य तक का समय उपयुक्त माना जाता है। हालांकि, स्थानीय मौसम और किस्म के अनुसार इसमें बदलाव हो सकता है। अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी में चने की फसल बेहतर होती है। खेत में पानी रुकने से जड़ों में सड़न और उखटा रोग की आशंका बढ़ जाती है।

चने की उन्नत किस्में

चने की किस्मों का चुनाव खेती के क्षेत्र, मिट्टी, सिंचाई की उपलब्धता और रोगों के प्रकोप को ध्यान में रखकर करना चाहिए। भारत में चने की दो प्रमुख श्रेणियां हैं।

1. देशी चना

देशी चने के दाने सामान्यतः छोटे और भूरे या गहरे रंग के होते हैं। इसकी खेती मध्य भारत, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर भारत के कई हिस्सों में की जाती है। इसकी कुछ प्रचलित किस्में जेएकेआई 9218, जेजी 11, जेजी 14, जेजी 16 और आरवीजी 202 हैं। हालांकि, किस्म का चयन क्षेत्रीय अनुशंसा के आधार पर ही करें।

2. काबुली चना

काबुली चने के दाने आकार में बड़े और हल्के क्रीम रंग के होते हैं। इसका उपयोग मुख्य रूप से छोले और अन्य खाद्य पदार्थों में किया जाता है। इसकी खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ मिट्टी उपयुक्त रहती है। काबुली चने की किस्मों का चुनाव भी स्थानीय जलवायु और बाजार की मांग के अनुसार करना चाहिए।

बीज और बुवाई का तरीका

किसान अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित देशी या काबुली चने की किस्मों का चयन करें। सामान्यतः देशी चने के लिए 60 से 80 किलोग्राम और काबुली चने के लिए 80 से 100 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है। बुवाई कतारों में करें और बीज को लगभग 5 से 8 सेंटीमीटर गहराई पर डालें। बीज बोने से पहले अनुशंसित फफूंदनाशक और राइजोबियम कल्चर से उपचार करना लाभकारी रहता है।

खाद और सिंचाई का रखें ध्यान

चने में खाद एवं उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी की जांच के आधार पर करें। फास्फोरस, पोटाश और सल्फर का संतुलित उपयोग फसल के विकास में मदद करता है। चने को बहुत अधिक सिंचाई की जरूरत नहीं होती। हालांकि, फूल आने और फलियां बनने के समय मिट्टी में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए। अधिक पानी देने से बचें।

खरपतवार और कीटों से बचाव

बुवाई के शुरुआती 30 से 45 दिन खरपतवार नियंत्रण के लिहाज से महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान जरूरत के अनुसार निराई-गुड़ाई करें। चने की फसल में फली छेदक इल्ली सबसे प्रमुख कीटों में शामिल है। इसकी इल्लियां फलियों में छेद करके दानों को नुकसान पहुंचाती हैं। नियमित निगरानी, फेरोमोन प्रपंच और पक्षी बैठका जैसे उपाय अपनाकर इसके प्रकोप को कम किया जा सकता है।

उखटा रोग से फसल को बचाएं

चने में उखटा और जड़ सड़न प्रमुख बीमारियां हैं। उखटा रोग में पौधे पीले होकर मुरझाने लगते हैं और धीरे-धीरे सूख जाते हैं। इससे बचाव के लिए रोग सहनशील किस्में लगाएं, बीजोपचार करें और फसल चक्र अपनाएं। खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था भी जरूरी है।

कटाई और भंडारण

किस्म के अनुसार चने की फसल लगभग 100 से 140 दिनों में पक जाती है। जब पौधे पीले पड़ने लगें और फलियां सूख जाएं, तब कटाई करें। गहाई के बाद दानों को अच्छी तरह सुखाकर साफ और सुरक्षित स्थान पर भंडारित करें। किसानों के लिए जरूरी सलाह: चने की खेती में समय पर बुवाई, बीजोपचार, सीमित सिंचाई और फली छेदक की निगरानी पर विशेष ध्यान दें। इन सावधानियों से फसल को नुकसान से बचाने और बेहतर उत्पादन प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।

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