नई दिल्ली: यदि आप खेती से लाभ कमाना चाहते हैं तो औषधीय पौधों की ओर रुख करना आज के समय में एक समझदारी भरा फैसला साबित हो सकता है। पारंपरिक फसलों की तुलना में कम जोखिम और अधिक मुनाफे के चलते अब देशभर के किसान हर्बल और मेडिसिनल क्रॉप्स की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इन्हीं औषधीय फसलों में शतावर एक ऐसी फसल बनकर उभरी है, जिसकी डिमांड तेजी से बढ़ रही है। आयुर्वेद में तो इसका उपयोग सदियों से हो रहा है, लेकिन अब एलोपैथिक दवाओं में भी इससे निकले यौगिकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। यही वजह है कि इसकी खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रही है।
शतावर को सुपर मेडिसिनल प्लांट भी कहा जा रहा है। इसकी खेती से किसानों को प्रति एकड़ दो से तीन लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा हो सकता है। यह पौधा 18 महीने में तैयार होता है और इसकी जड़ों से दवाइयां बनाई जाती हैं। फसल की खुदाई के समय इसकी गीली जड़ों का वजन 10 से 12 क्विंटल तक होता है, जो सुखाने के बाद 3 से 5 क्विंटल तक रह जाती हैं। इन सूखी जड़ों की बाजार में कीमत 30 हजार से लेकर 90 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक मिलती है। कीमत का निर्धारण जड़ों की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। यही नहीं, बाजार में इसकी लगातार मांग बनी हुई है, जिससे किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए कोई परेशानी नहीं होती।
शतावर का औषधीय महत्व भी बेहद खास है। इसका उपयोग महिलाओं की सेहत सुधारने से लेकर डायबिटीज, मिर्गी, जोड़ों के दर्द, एनीमिया और ल्यूकोरिया जैसी बीमारियों के इलाज में किया जाता है। शरीर में स्फूर्ति लाने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और वजन संतुलित करने में भी यह बेहद फायदेमंद मानी जाती है। फार्मा कंपनियों और आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली संस्थाओं में इसकी मांग तेजी से बढ़ी है।
इसकी खेती के लिए जुलाई-अगस्त का समय उपयुक्त होता है। इससे पहले मार्च-अप्रैल में नर्सरी में पौध तैयार की जाती है। दोमट या बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। खेत की 2-3 बार जुताई कर उसमें गोबर की खाद मिलाई जाती है, जिससे मिट्टी की उर्वरकता बढ़ती है। इसके साथ ही नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का संतुलित उपयोग उपज को बेहतर बनाता है। एक एकड़ के लिए 400 से 600 ग्राम बीज की जरूरत होती है, जिन्हें बुवाई से पहले गाय के मूत्र में भिगोकर बीज उपचार किया जाता है, जिससे फसल मिट्टी जनित रोगों से सुरक्षित रहे। नर्सरी में बीज बोने के करीब डेढ़ से दो महीने बाद जब पौधे 15 से 25 सेमी के हो जाते हैं, तो उन्हें खेत में रोप दिया जाता है।
शतावर की जड़ें 18 महीने में खुदाई के लिए तैयार हो जाती हैं। फरवरी से अप्रैल तक का समय खुदाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि तब जड़ों का विकास पूरा होता है और उनमें औषधीय गुण भी अधिक होते हैं। आज शतावर की खेती उन किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बन चुकी है जो पारंपरिक खेती से हटकर नई संभावनाओं की तलाश कर रहे हैं। कई राज्यों में कृषि अधिकारी भी इस फसल को बढ़ावा देने के लिए किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दे रहे हैं। ग्रामीण भारत में किसानों के लिए यह औषधीय फसल एक नई आर्थिक राह खोल रही है, जहां कम लागत में अधिक आमदनी की उम्मीद की जा सकती है।
