लखनऊ: उत्तर प्रदेश सरकार ने सार्वजनिक वित्त प्रबंधन के क्षेत्र में एक नया और व्यावहारिक मॉडल लागू किया है, जिसमें टैक्स को केवल राजस्व संग्रह का माध्यम नहीं माना जा रहा, बल्कि उसे सीधे विकास कार्यों से जोड़ा जा रहा है। यूपी के टैक्स मॉडल की इस नई व्यवस्था के तहत अब यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि किस स्रोत से प्राप्त धन किस क्षेत्र में खर्च हो रहा है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों बढ़ी हैं।
टैक्स से सीधे जुड़े विकास कार्य
सरकार द्वारा लागू इस मॉडल के अनुसार आबकारी राजस्व पर 0.5 प्रतिशत का गो कल्याण सेस लगाया गया है। यह कर मुख्य रूप से मदिरा बिक्री से जुड़ा है, जिससे आम उपभोक्ताओं पर बहुत अधिक बोझ नहीं पड़ता, लेकिन राज्य स्तर पर इससे बड़ी राशि एकत्रित होती है। इस धन का उपयोग सीधे आवारा गोवंश की देखभाल और उनके संरक्षण में किया जा रहा है। प्रदेश के विभिन्न गोवंश आश्रय स्थलों में हजारों पशुओं के लिए भोजन, आवास और उपचार की व्यवस्था की गई है। कृषि में मशीनों के बढ़ते उपयोग के कारण पशुओं पर निर्भरता कम होने से आवारा पशुओं की संख्या बढ़ी थी, जिसे अब इस योजना के माध्यम से नियंत्रित किया जा रहा है।
गांवों में सिंचाई और जल प्रबंधन को बढ़ावा
खनन से प्राप्त राजस्व को गांवों में सिंचाई सुविधाओं और जल प्रबंधन प्रणाली को बेहतर बनाने में लगाया जा रहा है। इससे किसानों को सीधे तौर पर लाभ मिल रहा है और खेती की उत्पादकता में सुधार हो रहा है। इसके अलावा मंडी से प्राप्त शुल्क का उपयोग फसल सुरक्षा और किसान कल्याण योजनाओं में किया जा रहा है। इस पूरी व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत इसकी पारदर्शिता है, जिससे आम नागरिक आसानी से समझ सकता है कि उसका दिया गया कर किस कार्य में उपयोग हो रहा है।
अन्य राज्यों के लिए बना उदाहरण
यूपी के टैक्स मॉडल से अन्य राज्य भी प्रेरणा ले सकते हैं। इस व्यवस्था के तहत हर राज्य अपनी विशेषताओं के अनुसार टैक्स को संबंधित विकास कार्यों से जोड़ सकता है। कृषि प्रधान राज्य मंडी शुल्क को किसानों के हित में उपयोग कर सकते हैं, जबकि अन्य क्षेत्र अपने मजबूत स्रोतों से प्राप्त राजस्व को उसी क्षेत्र के विकास में लगा सकते हैं। इस प्रकार यह मॉडल देशभर में विकास को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
ये भी पढ़ें: प्याज के उत्पादन में वृद्धि, लेकिन कीमतों में गिरावट से किसान चिंतित

