गन्ना भारत की सबसे महत्वपूर्ण नगदी फसलों में से एक है, लेकिन बदलता मौसम अब इसकी पैदावार और मिठास दोनों पर असर डाल रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र, नरकटियागंज, पश्चिम चंपारण के वरिष्ठ वैज्ञानिक और अध्यक्ष डॉ. आर.पी. सिंह ने बताया कि जिले के लगभग 50% से अधिक हिस्से में गन्ने की खेती होती है। इस साल अनियमित और कम बारिश, लंबे समय तक गर्मी और कहीं सूखे तो कहीं जलभराव ने गन्ने की फसल को गहरा नुकसान पहुंचाया है। बताया जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन से गन्ना खेती प्रभावित हो रही है।
गन्ने की पैदावार में 25% तक गिरावट का अनुमान
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम की यही स्थिति बनी रही तो गन्ने के उत्पादन में 15 से 25 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। वहीं, चीनी की रिकवरी यानी गन्ने के रस में चीनी की मात्रा (परता) भी 1 से 2 प्रतिशत तक घट सकती है। इससे किसानों और चीनी मिलों दोनों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा।
कैसे प्रभावित होता है गन्ना मौसम से?
डॉ. सिंह के मुताबिक गन्ना गर्म और नमी वाले उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है, लेकिन पश्चिम चंपारण उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में आता है। यहां सर्दियों में तापमान 4-5 डिग्री तक गिर जाता है और गर्मियों में 40-45 डिग्री तक पहुंच जाता है। यह उतार-चढ़ाव गन्ने की फसल के लिए हानिकारक है।
- सर्दियों में गन्ने की बढ़वार धीमी हो जाती है और कल्ले (नए अंकुर) कम निकलते हैं। हालांकि इस दौरान मिठास बढ़ती है।
- गर्मी में गन्ना जल्दी पक जाता है, उसमें फूल आ जाते हैं और उसकी बढ़वार रुक जाती है।
- अधिक तापमान में पौधा अपनी ऊर्जा के लिए जमा चीनी (सुक्रोज) को ग्लूकोज में बदल देता है। नतीजतन, गन्ने में मिठास कम होती है और रस की गुणवत्ता घट जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, गन्ने की अच्छी पैदावार और मिठास के लिए 20 से 35 डिग्री सेल्सियस का तापमान आदर्श है।
किसान कैसे बचा सकते हैं गन्ने की फसल?
डॉ. सिंह ने किसानों को बदलते मौसम में गन्ना बचाने के लिए कुछ अहम सुझाव दिए
- सही किस्मों का चुनाव करें: सूखा और बाढ़ सहनशील किस्मों को अपनाएं।
- बुआई का सही समय और तरीका अपनाएं: खेत में पर्याप्त नमी और अनुकूल तापमान होने पर ही बुआई करें।
- सिंचाई की आधुनिक तकनीकें अपनाएं: ड्रिप, स्प्रिंकलर या तालाब आधारित सिंचाई से पानी की कमी से बचा जा सकता है।
- कीट और रोग प्रबंधन करें: फसल की नियमित निगरानी करें और किसी भी समस्या पर तुरंत कृषि विज्ञान केंद्र या चीनी मिल के विशेषज्ञों से सलाह लें।
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