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दलहन किसानों के हितों के लिए सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार से मांगी रिपोर्ट

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नई दिल्ली: देश में दलहन किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत मिलने के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। किसान महापंचायत की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने केंद्र सरकार को संबंधित पक्षों के साथ बैठक कर पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट करने और विस्तृत रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने रिट याचिका संख्या 911/2025 की सुनवाई के दौरान यह आदेश पारित किया। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 8 मई 2026 की तारीख तय की है। न्यायालय ने यह भी कहा कि देश में दलहन उत्पादन को बढ़ावा देने और घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक नीतिगत कदमों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

दलहन उत्पादन बढ़ाने की योजना पर उठे सवाल

याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार ने देश में दलहन उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से छह वर्ष की अवधि का एक कार्यक्रम शुरू किया है, जिसके लिए लगभग 11400 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस योजना का उद्देश्य दलहन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करना और न्यूनतम समर्थन मूल्य आधारित खरीद व्यवस्था को मजबूत करना बताया गया है। हालांकि याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि दलहन आयात से जुड़ी सरकारी नीति कई मामलों में इस योजना की भावना से मेल नहीं खाती। इससे किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है और घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव बना रहता है।

आयात शुल्क शून्य करने से बढ़ी समस्या

किसान महापंचायत की ओर से अदालत में कहा गया कि सरकार ने एक समय पीली मटर के आयात पर शुल्क शून्य कर दिया था। इसके कारण विदेशी बाजार से बड़ी मात्रा में सस्ती दाल देश में आने लगी। परिणामस्वरूप घरेलू बाजार में चना और अरहर जैसी प्रमुख दलहन फसलों के दाम दबाव में आ गए और कई स्थानों पर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा।

किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने इसी मुद्दे को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी। उनका कहना है कि सस्ती आयातित दालों के कारण भारतीय दलहन किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है और उन्हें सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

आयात शुल्क बढ़ाने की सिफारिश भी हुई

याचिका में यह भी बताया गया कि केंद्रीय कृषि मंत्री ने इस विषय को गंभीर मानते हुए खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री को पत्र लिखकर पीली मटर पर आयात शुल्क बढ़ाने का सुझाव दिया था। पत्र में कहा गया था कि पीली मटर की आयात कीमत भारत में प्रमुख दलहनों की मंडी कीमतों से काफी कम है। ऐसे में घरेलू किसानों के हितों की रक्षा के लिए इस पर लगभग 50 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने की जरूरत है।

रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ा दलहन आयात

अदालत के सामने यह तथ्य भी रखा गया कि वर्ष 2024 के बाद से देश में दलहन का आयात रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है। इससे देश के दलहन उत्पादक किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ा है। न्यायालय ने इस पूरे मामले को गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह दलहन किसानों, नीति निर्माताओं और अन्य संबंधित पक्षों के साथ बैठक कर उनके विचारों को शामिल करे और उसके आधार पर विस्तृत रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे।

सुनवाई के दौरान किसान महापंचायत की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के साथ अधिवक्ता नेहा राठी, सौम्या कुमारी, काजल गिरी और प्रतीक यादव उपस्थित रहे। वहीं केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल वेंकटरमन के साथ अधिवक्ता गुरमीत सिंह मक्कड़, अमन झा, अश्वनी भारद्वाज और वरद किलोर अदालत में पेश हुए।

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