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सर्दियों में बछड़ों की खुराक का रखें विशेष ध्यान, ऐसे बढ़ेगी ग्रोथ

Pay special attention to the diet of calves in winter

नई दिल्ली: सर्दियों के मौसम में जहां गाय और भैंस जैसे बड़े पशुओं के लिए खुराक का प्रबंधन जरूरी होता है, वहीं नवजात और छोटे बछड़ों के लिए इस दौरान पोषण का विशेष महत्व बढ़ जाता है। जन्म के बाद शुरुआती तीन महीने बछड़े की तेज बढ़वार के होते हैं। इस अवधि में उम्र और मौसम के अनुसार संतुलित खुराक देने से उसकी शारीरिक वृद्धि बेहतर होने के साथ बीमारियों से बचाव में भी मदद मिल सकती है। दिसंबर और जनवरी के दौरान कड़ाके की ठंड पड़ने पर बछड़ों को ठंड से बचाने के लिए केवल रहने की जगह का प्रबंधन पर्याप्त नहीं है। उनके आहार में भी ऐसे पोषक तत्व शामिल होने चाहिए, जो शरीर को पर्याप्त ऊर्जा उपलब्ध करा सकें। सर्दियों में बड़े पशुओं की खुराक पर भी ध्यान देना जरूरी है, क्योंकि यह प्रजनन के लिहाज से महत्वपूर्ण समय माना जाता है।

जन्म के बाद बछड़े के पोषण पर दें विशेष ध्यान

जन्म के साथ ही बछड़े के पाचन तंत्र का विकास शुरू हो जाता है। उम्र बढ़ने के साथ उसका पेट रेशेदार चारे को पचाने के लिए धीरे-धीरे विकसित होता है। इसलिए बछड़े को शुरुआत से ही उसकी उम्र और पाचन क्षमता के अनुसार खुराक देने की जरूरत होती है। शुरुआती तीन महीने बछड़े की बढ़वार के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। करीब तीन महीने की उम्र में वह हरा रेशेदार चारा खाना शुरू कर सकता है। रेशेदार चारा उसके शरीर के रखरखाव और विकास में मदद करता है। सर्दियों में इससे शरीर को पाचन प्रक्रिया के दौरान अतिरिक्त ऊर्जा भी मिलती है, जिससे ठंड के तनाव को सहन करने में मदद मिल सकती है।

छह महीने तक विकसित होता है पाचन तंत्र

बछड़े का पेट करीब छह महीने की उम्र तक पूरी तरह विकसित होता है। इस दौरान उसके आहार में धीरे-धीरे बदलाव करना चाहिए और उसकी पाचन क्षमता के अनुसार चारे की मात्रा बढ़ानी चाहिए। पशु सामान्य तौर पर अपने शरीर के वजन का करीब 2.5 प्रतिशत तक आहार लेते हैं। हालांकि बछड़े की वास्तविक खुराक उसके वजन, उम्र, नस्ल, स्वास्थ्य और विकास की स्थिति के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए आवश्यकता के अनुसार पशु पोषण विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर होता है।

सर्दियों में नियमित रूप से उपलब्ध कराएं चारा

ठंड के मौसम में बछड़ों को पुआल, उपलब्ध हरी घास, पौष्टिक दाना मिश्रण और अच्छी गुणवत्ता वाला चारा देना चाहिए। चारे की नियमित उपलब्धता बनाए रखना भी जरूरी है, ताकि पशु को लंबे समय तक भूखा न रहना पड़े। पशु सामान्य तौर पर मोटे और रेशेदार चारे को पसंद करते हैं। ऐसे चारे को पचाने की प्रक्रिया में शरीर के भीतर अधिक गर्मी पैदा होती है। इसलिए सर्दियों में पर्याप्त मात्रा में रेशेदार चारा पशु को ऊर्जा उपलब्ध कराने में सहायक हो सकता है। यदि उपलब्ध चारे की मात्रा सीमित है तो दाना मिश्रण की गुणवत्ता और मात्रा को पशु की जरूरत के अनुसार समायोजित किया जा सकता है।

दाना एक साथ ज्यादा मात्रा में न खिलाएं

बछड़े को अनाज या दाना मिश्रण एक ही बार में बहुत अधिक मात्रा में देने से बचना चाहिए। दाना थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कई बार देना अधिक उचित हो सकता है। दाना मिश्रण की मात्रा को धीरे-धीरे बढ़ाया जाना चाहिए। आवश्यकता के अनुसार इसकी मात्रा प्रत्येक सप्ताह करीब 50 से 100 ग्राम तक बढ़ाई जा सकती है। अचानक बहुत अधिक दाना खिलाने से पाचन संबंधी समस्या और अम्लता बढ़ने जैसी परेशानी हो सकती है।

ठंड में कमजोर पशुओं का रखें ज्यादा ध्यान

ठंड का असर कमजोर और खराब शारीरिक स्थिति वाले पशुओं पर अधिक पड़ सकता है। ऐसे पशुओं में शरीर का तापमान बनाए रखने की क्षमता अपेक्षाकृत कम हो सकती है। इसलिए सर्दियों में बछड़ों और कमजोर पशुओं को पर्याप्त पौष्टिक खुराक के साथ ठंड से बचाने की व्यवस्था भी करनी चाहिए। पशुओं के रहने का स्थान सूखा और हवा के सीधे झोंकों से सुरक्षित होना चाहिए। साथ ही बिछावन की व्यवस्था साफ और सूखी रखनी चाहिए। भोजन और पानी की नियमित उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी चाहिए।

दूध देने वाली गाय के आहार में रेशे का रखें ध्यान

दूध देने वाली गाय के दूध में वसा की मात्रा कम होना उसके आहार में रेशे की कमी का संकेत हो सकता है। इसलिए दूध उत्पादन के साथ आहार में पर्याप्त रेशेदार चारा शामिल करना जरूरी है। पशु को केवल दाना या ऊर्जा देने वाला आहार अधिक मात्रा में देने के बजाय हरे और सूखे रेशेदार चारे तथा अन्य जरूरी पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखना चाहिए। संतुलित आहार पशु के स्वास्थ्य और दूध उत्पादन दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

ज्यादा दाना देने से हो सकती है परेशानी

बछड़े या बड़े पशु को जरूरत से अधिक दाना एक साथ खिलाने से पाचन तंत्र पर दबाव पड़ सकता है। इससे अम्लता जैसी समस्या उत्पन्न हो सकती है और पशु के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसलिए दाना मिश्रण की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ानी चाहिए और पशु की उम्र, वजन तथा उत्पादन क्षमता के अनुसार उसकी खुराक तय करनी चाहिए।

अतिरिक्त थन होने पर शुरुआत में ही कराएं उपचार

यदि किसी बछड़े में अतिरिक्त थन दिखाई दें तो पशुपालक को शुरुआत में ही पशु चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए। उचित समय पर उपचार या आवश्यक प्रक्रिया कराने से आगे चलकर होने वाली परेशानियों को कम किया जा सकता है। पशुपालकों को नवजात बछड़ों की शारीरिक बनावट, विकास और स्वास्थ्य पर नियमित नजर रखनी चाहिए। किसी भी असामान्यता की स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह लेना अधिक सुरक्षित रहेगा।

सर्दियों में खुराक के साथ प्रबंधन भी जरूरी

सर्दियों में बछड़ों की बेहतर बढ़वार के लिए केवल अधिक चारा देना पर्याप्त नहीं है। उम्र के अनुसार खुराक में बदलाव, पर्याप्त रेशेदार चारा, पौष्टिक दाना मिश्रण, नियमित भोजन और ठंड से बचाव सभी जरूरी हैं। शुरुआती तीन महीनों में बछड़े के पोषण पर विशेष ध्यान देकर उसकी मजबूत नींव तैयार की जा सकती है। वहीं करीब छह महीने तक पाचन तंत्र के विकास को ध्यान में रखते हुए धीरे-धीरे उसकी खुराक में बदलाव किया जाना चाहिए।

पशुपालकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी आहार को अचानक अधिक मात्रा में शुरू न करें। पशु की स्थिति के अनुसार धीरे-धीरे बदलाव करना और जरूरत पड़ने पर पशु पोषण विशेषज्ञ या पशु चिकित्सक की सलाह लेना बछड़े की बेहतर वृद्धि और स्वास्थ्य के लिए सबसे उचित तरीका है।

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