खेती-किसानी

बरसात के मौसम में पपीते की खेती को चाहिए विशेष देखभाल

papita

नई दिल्ली: भारत में पपीते की खेती लगातार लोकप्रिय होती जा रही है। छोटे किचन गार्डन से लेकर बड़े व्यवसायिक बागानों तक, पपीते की खेती का क्षेत्र दिन-ब-दिन फैलता जा रहा है। 2022 के आंकड़ों के अनुसार, भारत विश्व में पपीता उत्पादन में पहले स्थान पर है, जहां कुल वैश्विक उत्पादन का 31.51 प्रतिशत यहीं होता है। सालाना लगभग 50.75 लाख टन उत्पादन और 1.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल के साथ यह देश के सबसे ज्यादा उगाए जाने वाले फलों में पांचवें स्थान पर है। किसानों के लिए यह फसल काफी लाभदायक सिद्ध हो रही है। यह तेजी से फल देता है, बाजार में इसकी मांग स्थिर बनी रहती है और इसकी खेती से अच्छी आमदनी भी होती है। लेकिन इसका एक बड़ा जोखिम है-बरसात का मौसम। पपीते की खेती के लिए यह सबसे चुनौतीपूर्ण समय होता है, जिसमें पौधों को बचाना मुश्किल हो जाता है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा-समस्तीपुर के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक और पूर्व प्रधान अन्वेषक डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार, यदि खेत में 24 घंटे से अधिक समय तक पानी जमा रहा, तो पपीते के पौधों को बचाना लगभग असंभव हो जाता है। उनका कहना है कि बरसात के समय पपीते की खेती से बचना ही बेहतर होता है। दरअसल, पपीते की जड़ें सतही होती हैं और ये लंबे समय तक जलभराव नहीं झेल सकतीं। जब खेतों में पानी भर जाता है, तो मिट्टी में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है, जिससे जड़ें सड़ने लगती हैं। इसी स्थिति में फाइटोफ्थोरा और पायथियम जैसे फफूंद जनित रोग तेजी से फैलते हैं और पूरे खेत को चपेट में ले लेते हैं। लगातार गीली मिट्टी और वातावरण में अधिक नमी फंगल और बैक्टीरियल रोगों के लिए अनुकूल माहौल बना देती है। इस समय पपीते में एन्थ्रेक्नोज, ब्लैक स्पॉट और रिंग स्पॉट वायरस जैसी बीमारियां तेज़ी से फैलती हैं, जिनका नियंत्रण करना बेहद कठिन होता है।

सही मात्रा में उर्वरक डालना है ज़रूरी

तेज बारिश के कारण मिट्टी से जरूरी पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम बह जाते हैं। इससे पौधों की वृद्धि रुक जाती है, फल कमज़ोर और स्वादहीन हो जाते हैं, और किसानों को अधिक मात्रा में उर्वरक डालने की जरूरत पड़ती है, जिससे लागत बढ़ जाती है। इसके अलावा, बारिश में फल मक्खी, एफिड, व्हाइट फ्लाई और स्लग जैसे कीटों की संख्या बढ़ जाती है, जो पपीते को नुकसान पहुंचाते हैं और कई बार बीमारियों के वाहक भी बनते हैं।

प्राकृतिक आपदाएं जैसे भारी वर्षा, तेज़ हवाएं और ओलावृष्टि पपीते के कोमल पौधों को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाती हैं। ये पौधे आसानी से टूट जाते हैं या उखड़ जाते हैं। विशेषकर नए पौधे इस स्थिति में बहुत ही संवेदनशील होते हैं। इसके साथ ही, अधिक नमी के कारण कटाई के बाद पपीते के फल जल्दी खराब हो जाते हैं, उनकी गुणवत्ता घट जाती है और भंडारण में दिक्कत आती है। इससे बाजार में उनका मूल्य गिरता है और किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

पपीते के लिए शुष्क मौसम बेहतर

इन सभी कारणों से विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि पपीते की खेती के लिए शुष्क मौसम का चयन करना अधिक उपयुक्त है। इस दौरान सिंचाई को नियंत्रित किया जा सकता है, जलनिकासी अच्छी रहती है और फसल रोगों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहती है। सही मौसम और वैज्ञानिक विधियों को अपनाकर किसान बेहतर उपज और गुणवत्ता वाले फलों की प्राप्ति कर सकते हैं। पपीता एक लाभदायक फसल है, लेकिन गलत मौसम में इसकी खेती करना किसानों के लिए भारी नुकसान का कारण बन सकता है। उचित जानकारी, समय और तकनीक के साथ की गई खेती ही इस फसल की पूरी संभावनाओं को साकार कर सकती है।

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