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सरसों की फसल पर ओरोबैंकी का हमला, इन राज्यों में पैदावार पर खतरा

mustard crop

हिसार: भारत में खाद्य तेल उत्पादन की सबसे बड़ी फसल मानी जाने वाली सरसों इन दिनों एक गंभीर और छिपे हुए संकट का सामना कर रही है। देश में करीब 90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सरसों की खेती होती है, जिसमें राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पश्चिम बंगाल प्रमुख राज्य हैं। लेकिन अब ओरोबैंकी एजिप्टियाका नामक एक परजीवी खरपतवार सरसों की फसल के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। यह खरपतवार जमीन के नीचे सरसों की जड़ों से चिपककर पौधों से पोषक तत्व, पानी और कार्बन खींच लेता है, जिससे पौधे पीले पड़ जाते हैं, मुरझा जाते हैं और उनकी बढ़वार रुक जाती है। इसका सीधा असर दानों की पैदावार पर पड़ता है।

हरियाणा के किसान सबसे ज्यादा परेशान

हरियाणा के कई सरसों उत्पादक किसान इस समस्या से बुरी तरह जूझ रहे हैं। किसानों का कहना है कि तीन साल पहले तक उनके खेतों में इस परजीवी खरपतवार का नामोनिशान नहीं था। उस समय औसत पैदावार करीब 9 क्विंटल प्रति एकड़ रहती थी और अच्छे मौसम में यह 12 क्विंटल तक पहुंच जाती थी। लेकिन रबी सीजन 2024-25 में कई किसानों को केवल 6 क्विंटल प्रति एकड़ की पैदावार ही मिल सकी। किसानों के अनुसार हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की सलाह पर उन्होंने ग्लाइफोसेट खरपतवारनाशी का छिड़काव किया, लेकिन 30 और 55 दिन बाद किए गए दोनों छिड़काव का कोई खास असर नहीं दिखा।

सरसों की खेती से दूरी बना रहे किसान

मर्गोजा के बढ़ते प्रकोप से निराश होकर किसान अब सरसों की बुवाई कम कर रहे हैं। एक किसान ने बताया कि जहां पहले उनकी तीन-चौथाई जमीन पर सरसों की खेती होती थी, अब उन्होंने सरसों का रकबा काफी घटा दिया है। इस साल 32 एकड़ में से केवल 6 एकड़ में सरसों बोई गई, जबकि बाकी क्षेत्र में गेहूं, चना और जौ की बुवाई की गई है। किसानों का कहना है कि सरसों में कम सिंचाई की जरूरत होती है, लेकिन ओरोबैंकी ने इस फसल से भरोसा तोड़ दिया है।

जमीन के नीचे पनपता छिपा हुआ खतरा

जोधपुर स्थित साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर के निदेशक भागीरथ चौधरी के अनुसार हरियाणा और राजस्थान के प्रमुख सरसों उत्पादक इलाकों में ओरोबैंकी अब सबसे बड़ा छिपा हुआ खतरा बन चुकी है। यह खरपतवार जमीन के नीचे रहकर सरसों की जड़ों से जुड़ जाती है और जब तक इसके तने जमीन के ऊपर दिखाई देते हैं, तब तक फसल को भारी नुकसान हो चुका होता है।

बार-बार सरसों बोना बना बड़ी वजह

SABC द्वारा सिरसा और भिवानी जिलों में किए गए फील्ड सर्वे में पाया गया कि जिन खेतों में लगातार सरसों की खेती की जा रही है, वहां ओरोबैंकी का प्रकोप सबसे ज्यादा है। इस खरपतवार का एक पौधा 40 से 45 फूल देता है और हर फूल में हजारों सूक्ष्म बीज होते हैं, जो मिट्टी में 20 साल तक जीवित रह सकते हैं। पहली सिंचाई के समय मिलने वाली नमी इसके अंकुरण को बढ़ावा देती है और यह जमीन के नीचे ही सरसों की जड़ों से जुड़ जाती है।

खाद्य तेल सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती

सरसों भारत के स्वदेशी खाद्य तेल उत्पादन में चार मिलियन टन से अधिक का योगदान देती है। देश हर साल बड़ी मात्रा में खाद्य तेल आयात करता है, जिस पर अरबों डॉलर खर्च होते हैं। ऐसे में सरसों की उत्पादकता में गिरावट देश की खाद्य तेल आत्मनिर्भरता के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ओरोबैंकी के साथ-साथ कीट और फफूंद रोगों के बढ़ते खतरे को देखते हुए सरसों किसानों की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है, ताकि इस अहम फसल को बचाया जा सके।

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