कृषि समाचार

एमएसपी पर सरकारी खरीद में रिकॉर्ड खर्च, फिर भी गारंटी की मांग तेज

Government procurement at MSP crop market

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद (Government procurement at MSP) में अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड कायम किया है। पहली बार सरकारी खरीद पर 3 लाख 47 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई है। इससे पहले 2020-21 में एमएसपी के तहत सबसे अधिक 2 लाख 80 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे। सरकार का कहना है कि यह बढ़ोतरी सिर्फ एमएसपी दरों में वृद्धि की वजह से नहीं, बल्कि खरीदी जाने वाली फसलों की मात्रा और लाभार्थी किसानों की संख्या में बड़े इजाफे के कारण हुई है।

हालांकि, इन आंकड़ों के बावजूद एमएसपी की कानूनी गारंटी को लेकर किसान संगठनों की मांग लगातार तेज हो रही है। संयुक्त किसान मोर्चा-गैर-राजनीतिक सहित कई संगठन एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाने की मांग पर आंदोलन कर रहे हैं। विपक्षी दल भी इसी मुद्दे पर सरकार को घेर रहे हैं और सवाल उठा रहे हैं कि जब सरकार खुद दाम तय करती है तो उसकी गारंटी देने में संकोच क्यों।

रिकॉर्ड खरीद और लाभार्थियों में बढ़ोतरी

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में एमएसपी पर 3.47 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि 2023-24 में यह आंकड़ा 2.63 लाख करोड़ रुपये था। इसी तरह, एमएसपी के तहत खरीदी गई कृषि उपज की मात्रा 2024-25 में बढ़कर 1,223 लाख मीट्रिक टन हो गई, जो 2023-24 में 1,089 लाख मीट्रिक टन थी। एमएसपी का लाभ लेने वाले किसानों की संख्या में भी बड़ा उछाल देखा गया है। 2024-25 में 196.35 लाख किसानों को एमएसपी का फायदा मिला, जबकि 2023-24 में यह संख्या 152.35 लाख थी।

पुराने आंकड़ों को अपडेट करने की जरूरत

2015 में शांता कुमार समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि केवल 6 प्रतिशत किसानों को ही एमएसपी का सीधा लाभ मिलता है। किसान संगठन आज भी इस आंकड़े का हवाला देते हैं। लेकिन सरकार का कहना है कि तब से हालात बदले हैं। अब न केवल धान और गेहूं बल्कि दलहन और तिलहन की खरीद भी काफी बढ़ी है। मौजूदा समय में लगभग 14 प्रतिशत किसान परिवारों को एमएसपी का लाभ मिल रहा है। देश में करीब 14 करोड़ किसान परिवार हैं, जिनमें से लगभग 1.96 करोड़ एमएसपी से लाभान्वित हो चुके हैं।

फिर आंदोलन क्यों?

एमएसपी पर सरकारी खरीद बढ़ने के बावजूद किसानों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि एमएसपी की कोई कानूनी गारंटी नहीं है। एमएसपी केवल सरकारी एजेंसियों पर लागू होता है, निजी व्यापारियों पर नहीं। यही वजह है कि कई बार मंडियों में किसानों को घोषित एमएसपी से कम दाम पर फसल बेचनी पड़ती है। किसान संगठन चाहते हैं कि कानून के जरिए निजी क्षेत्र को भी एमएसपी से कम कीमत पर खरीद करने से रोका जाए।

फार्मूले को लेकर भी विवाद

एमएसपी निर्धारण के फार्मूले को लेकर भी सरकार और किसानों के बीच मतभेद है। फिलहाल सरकार A2+FL (वास्तविक लागत + पारिवारिक श्रम का मूल्य) फार्मूले के आधार पर एमएसपी तय करती है, जबकि किसान C2 (समग्र लागत) फार्मूले को लागू करने की मांग कर रहे हैं, जिसकी सिफारिश स्वामीनाथन आयोग ने की थी।

उदाहरण के तौर पर, खरीफ मार्केटिंग सीजन 2025-26 में धान का एमएसपी 2369 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि C2 फार्मूले के अनुसार यह 3135 रुपये होना चाहिए। यानी प्रति क्विंटल करीब 766 रुपये का अंतर है। इसी तरह अरहर का मौजूदा एमएसपी 8000 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि C2 फार्मूले से यह 10,258.5 रुपये होना चाहिए।

कौन करता है एमएसपी पर खरीद

सरकार भारतीय खाद्य निगम (FCI) और राज्य एजेंसियों के जरिए अनाज व मोटे अनाज की खरीद करती है। जब दलहन, तिलहन और कोपरा के बाजार भाव एमएसपी से नीचे आते हैं तो प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) के तहत मूल्य समर्थन योजना के जरिए खरीद होती है।

नेफेड और एनसीसीएफ पीएम-आशा योजना के तहत प्रमुख खरीद एजेंसियां हैं। वहीं कपास की खरीद कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) और जूट की खरीद जूट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (JCI) द्वारा की जाती है।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों पर सरकार 22 अधिसूचित फसलों के लिए एमएसपी तय करती है, जिनमें 14 खरीफ, 6 रबी और 2 वाणिज्यिक फसलें शामिल हैं।

सरकारी आंकड़े भले ही एमएसपी पर बढ़ती खरीद और खर्च की तस्वीर दिखाते हों, लेकिन जब तक एमएसपी को कानूनी गारंटी नहीं मिलती, तब तक यह मुद्दा किसानों और सरकार के बीच टकराव का बड़ा कारण बना रहेगा।

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